
सोनजुही
Sonjuhi
Sumitranandan Pant
1 verse · ~31 lines · 2 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

2 verses · ~1 min
छोड़ द्रुमों की मृदु-छाया, तोड़ प्रकृति से भी माया, बाले! तेरे बाल-जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन? भूल अभी से इस जग को! तज कर तरल-तरंगों को, इन्द्र-धनुष के रंगों को, तेरे भ्रू-भंगों से कैसे बिंधवा दूँ निज मृग-सा मन? भूल अभी से इस जग को! कोयल का वह कोमल-बोल, मधुकर की वीणा अनमोल, कह, तब तेरे ही प्रिय-स्वर से कैसे भर लूँ सजनि! श्रवन? भूल अभी से इस जग को! ऊषा-सस्मित किसलय-दल, सुधा रश्मि से उतरा जल, ना, अधरामृत ही के मद में कैसे बहला दूँ जीवन? भूल अभी से इस जग को!
रचनाकाल: जनवरी १९१८
इति

Paired Painting
Menaka and Vishvamitra
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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Moha carries.