
धातुएँ
Dhatuven
Naresh Saxena
7 verses · ~22 lines · 1 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

7 verses · ~1 min
क्या मेरी आत्मा का चिर-धन? मैं रहता नित उन्मन, उन्मन!
प्रिय मुझे विश्व यह सचराचर, त्रिण, तरु, पशु, पक्षी, नर, सुरवर, सुन्दर अनादि शुभ सृष्टि अमर;
निज सुख से ही चिर चंचल-मन, मैं हुँ परतिपल उन्मन, उन्मन ।
मैं प्रेमी उच्चाद्रशों का, संस्कृति के स्वर्गिक-स्पर्शो का, जीवन के हर्ष-विमर्शों का:
लगता अपुर्ण मानव जीवन, मैं इच्छा से उन्मन, उन्मन!
जग-जीवन में उल्लास मुझे, नव-आशा, नव अभिलाष मुझे, ईश्वर पर चिर विश्वास मुझे;
चाहिए विश्व को नवजीवन, मैं आकुल रे उन्मन, उन्मन ।
इति

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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Atma Ka Chir Dhan carries.