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सब दुखहरन सुखकर परम हे नीम! जब देखूँ तुझे। तुहि जानकर अति लाभकारी हर्ष होता है मुझे॥ ये लहलही पत्तियाँ हरी, शीतल पवन बरसा रहीं। निज मंद मीठी वायु से सब जीव को हरषा रहीं॥ हे नीम! यद्यपि तू कड़ू, नहिं रंच-मात्र मिठास है। उपकार करना दूसरों का, गुण तिहारे पास है॥ नहिं रंच-मात्र सुवास है, नहिं फूलती सुंदर कली। कड़ुवे फलों अरु फूल में तू सर्वदा फूली-फली॥ तू सर्वगुणसंपन्न है, तू जीव-हितकारी बड़ी। तू दु:खहारी है प्रिये! तू लाभकारी है बड़ी॥ है कौन ऐसा घर यहाँ जहाँ काम तेरा नहिं पड़ा। ये जन तिहारे ही शरण हे नीम! आते हैं सदा॥ तेरी कृपा से सुख सहित आनंद पाते सर्वदा॥ तू रोगमुक्त अनेक जन को सर्वदा करती रहै। इस भांति से उपकार तू हर एक का करती रहै॥ प्रार्थना हरि से करूँ, हिय में सदा यह आस हो। जब तक रहें नभ, चंद्र-तारे सूर्य का परकास हो॥ तब तक हमारे देश में तुम सर्वदा फूला करो। निज वायु शीतल से पथिक-जन का हृदय शीतल करो॥
(यह सुभद्रा जी की पहली कविता है जो 1913 में "मर्यादा" नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। तब वे मात्र 9 साल की थीं। )
इति

Paired Painting
Hermitage of Valmiki, Folio from the Nadaun Ramayana
This exquisite folio captures a moment of profound spiritual sanctuary within the hermitage of the sage Valmiki. As the Ramayana reaches its poignant conclusion, the forest setting becomes a haven of peace where the divine Sita finds refuge and maternal grace. The artist invites us to witness a landscape where nature and spirit coalesce, depicting the animals living in harmonious proximity to the holy hermitage. Every stroke reflects the deep reverence held for the epic tradition, portraying a world where the sorrows of the mortal realm are softened by the serenity of forest life and the wisdom of the sages.
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