№ MMXXVI

RACHNA · A LIVING ARCHIVE

Rachna by M.

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MM · XXVI

Canvas
Gangavatarana

Veera

रेत में कलाकार

Ret Mein Kalakar

Shriprakash Shukla
1 min read 7 versesकलाकारartistसृजन

7 verses · ~1 min

बालू के कण कण साथ ले चलो उड़ जा हारिल की नाईं सुबह हुई अब सपने छूटे उठ जा हरकारे की ठाईं।

ठोक पीटकर आकृति दे दो बांधो नदी नाव की खाईं जग जीतो सब लहरें गिन लो कर लो तट को वश में साईं ।

तेरे हाथों में है ताकत बढ़ो सृजन पथ माथ न दो तेरी मुटठी में दुनिया है बाधो हाथ विराम न दो ।

बालू गंगा का स्वरुप है गंगा क्या इतनी-सी, पर है बालू बालू में प्रवाह को किसने धारा दी, जी भर है ।

लेाग रहेंगे आते-जाते तन भर तुझको देखेंगे उठते-गिरते जो संभलेंगे मन भर तुमको भेटेंगें ।

इस या उस की बात नहीं है हर आकृति में तेरा बल है जो दुनिया से चलकर जाता तेरी नज़रों की हलचल है ।

रचनाकाल: 12.03.2008

इति

Shriprakash Shukla

The Poet

श्रीप्रकाश शुक्ल

Shriprakash Shukla

Gangavatarana

Paired Painting

Gangavatarana

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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Ret Mein Kalakar carries.