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लम्बा रास्ता
Lamba Rasta
Shalabh Shriram Singh
6 verses · ~18 lines · 1 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

Veera
Hasti Ko Hasrat Ki Nayee Rah Guzar Karo
Shalabh Shriram Singh9 verses · ~2 min
हस्ती को हसरत की नई रह गुज़र करो सूरज ढलान पर है शमआ को खबर करो
यह सच है अन्धेरे का समंदर है सामने रोशन दिमाग लोगो! बढ़ो, बढ़के सर करो
तारीकियों को शोर पिलाती है यह हवा मश अल बदस्त-बाजे जिरस तेज़तर करो [1]
गो भीड़ बेशुमार है पर रास्ता तो है थोड़ा-सा सब्र रख के इसी पर सफ़र करो
तुम तो नतीजतन ग़मे दुनिया की नज़्र हो अश्कों को अब न शामिले-ख़ूने जिगर करो
यह हल्क-ए निज़ात है क्या सोच रहे हो करना तुम्हे है जो भी शलभ सर-ब-सर करो
रचनाकाल: 03 जनवरी 1983, विदिशा
शलभ श्रीराम सिंह की यह रचना उनकी निजी डायरी से कविता कोश को चित्रकार और हिन्दी के कवि कुँअर रवीन्द्र के सहयोग से प्राप्त हुई। शलभ जी मृत्यु से पहले अपनी डायरियाँ और रचनाएँ उन्हें सौंप गए थे।
शब्दार्थ:
इति

Paired Painting
Jauhar
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