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Yogamaya Escaping from Kamsa

VeeraIntermediate

वो सुबह कभी तो आएगी

Vo Subah Kabhi To Aayegi

Sahir Ludhianvi
2 min read 17 versesMorningHumanityHunger

17 verses · ~2 min

वो सुबह कभी तो आएगी

इन काली सदियों के सर से जब रात का आंचल ढलकेगा जब दुख के बादल पिघलेंगे जब सुख का सागर झलकेगा जब अम्बर झूम के नाचेगा जब धरती नगमे गाएगी

वो सुबह कभी तो आएगी

जिस सुबह की ख़ातिर जुग जुग से हम सब मर मर के जीते हैं जिस सुबह के अमृत की धुन में हम ज़हर के प्याले पीते हैं इन भूखी प्यासी रूहों पर इक दिन तो करम फ़रमाएगी

वो सुबह कभी तो आएगी

माना कि अभी तेरे मेरे अरमानों की क़ीमत कुछ भी नहीं मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर इन्सानों की क़ीमत कुछ भी नहीं इन्सानों की इज्जत जब झूठे सिक्कों में न तोली जाएगी

वो सुबह कभी तो आएगी

दौलत के लिए जब औरत की इस्मत को ना बेचा जाएगा चाहत को ना कुचला जाएगा, इज्जत को न बेचा जाएगा अपनी काली करतूतों पर जब ये दुनिया शर्माएगी

वो सुबह कभी तो आएगी

बीतेंगे कभी तो दिन आख़िर ये भूख के और बेकारी के टूटेंगे कभी तो बुत आख़िर दौलत की इजारादारी के जब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जाएगी

वो सुबह कभी तो आएगी

मजबूर बुढ़ापा जब सूनी राहों की धूल न फांकेगा मासूम लड़कपन जब गंदी गलियों में भीख न मांगेगा हक़ मांगने वालों को जिस दिन सूली न दिखाई जाएगी

वो सुबह कभी तो आएगी

फ़आक़ों की चिताओ पर जिस दिन इन्सां न जलाए जाएंगे सीने के दहकते दोज़ख में अरमां न जलाए जाएंगे ये नरक से भी गंदी दुनिया, जब स्वर्ग बनाई जाएगी

वो सुबह कभी तो आएगी

जिस सुबह की ख़ातिर जुग जुग से हम सब मर मर के जीते हैं जिस सुबह के अमृत की धुन में हम ज़हर के प्याले पीते हैं वो सुबह न आए आज मगर, वो सुबह कभी तो आएगी

वो सुबह कभी तो आएगी

इति

Sahir Ludhianvi

The Poet

साहिर लुधियानवी

Sahir Ludhianvi

Yogamaya Escaping from Kamsa

Paired Painting

Yogamaya Escaping from Kamsa

In the deep shadows of a prison cell in Mathura, the divine drama of liberation unfolds with breathtaking urgency. The tyrant Kamsa, consumed by dread and arrogance, lunges backward in sheer terror as the celestial goddess Yogamaya slips from his grasp. Bathed in a radiant, heavenly halo, the divine feminine ascends into the night sky, her multi armed form a symbol of cosmic illusion and ultimate truth. Below, Vasudeva and Devaki stand with hands joined in reverent prayer, their faces illuminated by the soft, ethereal glow of grace amidst captivity. Raja Ravi Varma masterfully captures this pivotal mythological threshold, where mortal tyranny shatters against the luminous expanse of the divine.

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