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The Pandavas arrive in Hastinapur

KarunaIntermediate

वहाँ हरगिज़ नहीं जाना

Vahan Hargiz Nahin Jana

Pratibha Saxena
3 min read 8 versesSadnessMemoryCity

8 verses · ~3 min

जहां के लिये उमड़े मन वहाँ हरगिज़ नहीं जाना

न आओ दिख रहा लिक्खा जहाँ के बंद द्वारों पर फकत बहुमंजिलों की भीड़ में सहमा हुआ सा घर खड़े होगे वहां जाकर लगेगा कुयें सा गहरा ढका जिस पर कि बस दो हाथ-भर आकाश का टुकड़ा, हवायें चली आतीं मन मुताबिक जा न पाती हो सुबह की ओस भी तो भाप बन फिर लौट जाती हो नये लोगों, नई राहों, नये शहरों भटक आना, पुराने चाव ले पर उस शहर हरगिज़ नहीं जाना

घरों में गुज़र मत पूठो कि पहले ही जगह कम है, ज़रा सी बात है यह तो, हुई फिर आंख क्यों नम है किसी पहचान का पल्ला पकड़ना गैरवाजिब है, किसी के हाल पूछो मत, यहाँ हर एक आजिज़ है वहां पर जो कि था पहले नहीं पहचान पाओगे निगाहें अजनबी जो है उन्हें क्या क्या बताओगे! बचपना भूल जाना सदा को, मत लौट कर जाना, कि मन को, अन्न-पानी चुक गया उस ठौर समझाना

बदलती करवटों जैसी सभी पहचान मिट जाती यहाँ तो आज कल दुनिया बड़ी जल्दी बदल जाती रहोगे हकबकाये से कि उलटे पाँव फिर जायें कि चारो ओर से जैसे यही आवाज़ सी आये, अजाना कौन है यह, क्यों खड़ा है जगह को घेरे? पराया है सभी, अपना नहीं कुछ भी बचा है रे! वहाँ कुछ भी नहीं रक्खा, लगेगा अजनबी पन बस यही बस गाँठ बाँधो फिर वहाँ फिर कर नहीं जाना

पुरानी डगर पर धरने कदम हरगिज़ नही जाना! बज़ारों में निकल जाना, दुकानें घूम-फिर आना कहीं रुक पूछ कर कीमत उसे फिर छोड़ बढ़ जाना, बज़ारों का यहां फैलाव कितना बढ़ गया देखो, दुकानों में नहीं पहचान स्वागत है सभी का तो. दुबारा नाम मत लेना कि चाहे मन करे कितना वहां कुछ ढूँढने अपना न भूले से निकल जाना, बचा कर आँख अपनी उन किनारों से निकल जाना.

नयों के साथ धुँधला - सा,न जाने क्या सिमट आता! वहाँ अब कुछ नहीं है, सभी कुछ बीता सभी रीता, हवा में रह गया बाकी कहीं अहसास कुछ तीखा । गले तक उमड़ता रुँधता, नयन में मिर्च सा लगता बड़ा मुश्किल पड़ेगा सम्हलना तब बीच रस्ते में लिफ़ाफ़ा मोड़ वह सब बंद कर दो एक बस्ते में समझ में कुछ नहीं आता मगर आवेग सा उठता । घहरती, गूँजती सारी पुकारों को दबा जाना!

अगर फिर खींचेने को चिपक जाये पाँव से माटी छुटा दो आँसुओं से धो, नदी तो जल बिना सूखी महक कोई भटकती, साँस में आ कर समा जाये किसी आवाज़ की अनुगूँज कानों तक चली आये हवा की छुअन अनजानी पुलक भर जाय तन-मन में हमें क्या- सोच कर यह टाल देना एक ही क्षण में समझना ही नहीं चाहे अगर मन, मान मत जाना! तुम्हारा वह शहर उजड़ा, वहाँ हर्गिज़ नहीं जाना नई जगहें तलाशो, सहज ग़ैरों में समा जाना!

वहां बिल्कुल नहीं जाना, वहां हरगिज़ नहीं जाना!

इति

Pratibha Saxena

The Poet

प्रतिभा सक्सेना

Pratibha Saxena

The Pandavas arrive in Hastinapur

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