
16 verses · ~5 min
लाख भुलाऊँ नहीं भूलती मित्रों, एक कहानी, मन को थोड़ा हलका कर लूँ कह कर उसे ज़ुबानी. पहले मेरे साथ ज़रा-सा दूर इधर आ जाओ, नेह भरा वसुधा का आँचल कुछ पल यहाँ बिताओ.
देवदारु वाला वह पर्वत, नीचे फैली घाटी, हरे-भरे ये वृक्ष लताएँ, उर्वर-उर्वर माटी. वह देखो पर्वत से झरता छल-छल करता झरना, कलकल छलछल कोमल-कोमल चंचल शिशु सा झरना. धरती-माँ का उमग-उमग शिशु को बाहों में भरना. वनपाँखी का कलरव गूँजे, कुह-कुह ट्वीटी क्रींक्रीं, गाए रम्य वनाली फूली, झुक-झुक जाए डाली.
मुक्त गगन में श्वेत कपोतों का दल पंख पसारे, पूरव से पश्चिम तक उड़ता प्रतिदिन साँझ-सकारे! एक पँखेरू ने धरती की ओर दृष्टि जब मोड़ी, रम्य धरा पर उतर पड़ी तब वह कपोत की जोड़ी. जल पीकर संतुष्ट और यौवन के मद में माती, नीलमवाली घाटी में वह घूमी पंख फुलाती. कपोती ने कपोत से कहा - यह रमणीय वनाली. ऊँचा-ऊँचा पर्वत फैला, घाटी फूलोंवाली.
'सखे,इस बरस यहीं नीड़ रच अपना, साकार करें हम मधुर प्रेम का सपना!’ प्रेमी कपोत क्यों बात प्रिया की टाले सुख में विभोर वे चोंच चोंच में डाले. झरने से थोड़ा हट कर नीड़ बनाया, कोमल काँसों रेशों से सुखद बनाया. दिन-दिन भर दोनों घाटी पर पर्वत पर, वृक्षों पर नभ में उड़ते फिरते जी भर. चक्कर खाते झुक- झूम प्यार बरसाते, फिर पंख पसारे उमग-उमग हरषाते. संध्या होती तो लौट नीड़ में दोनों मीठे सपनों से भरी नींद सो जाते!
(फिर घोंसले में कपोत-शिशुओं की किलकारी गूँजी)
बारी-बारी से दोनों दाना लाते, अमरित सा पानी लाकर प्यास बुझाते, पंखों से अपने शिशुओँ को छा लेते गूँ-गुटुर-गुटुरगूँ लोरी भी गा लेते. फिर बच्चे बाहर आ बैठे शाखों पर, नर खिला रहा था उनको फुदक-फुदक कर. हलकी उड़ान भर लौट नीड़ में आते, दिन बीत रहे थे यों ही हँसते-गाते. अब फिर से वे आकाश थाहते फिरते, लौटते नीड़ में, मंद पवन में तिरते.
फिर एक दिन क्या हुआ- उस दिन दोनों पर्वत के पार गए थे, आपस में होड़ लगा कर उड़ते-उड़ते, कैसा तो होने लगा कपोती का मन, वह लौट पड़ी थी आगे बढ़ते-बढ़ते.
कुछ लगी भयावह भायँ-भायँ सी घाटी, तो धक्क रह गई स्नेहिल माँ ती छाती. कुछ लगा कि जैसे रात हो गई दिन में फिर मौत सरीखी शान्ति छा गई वन में. आ गई नीड़ के पास पुकार लगायी, उसको अपने प्रियतम की सुधि भी आई.
वह डाल-डाल पर घबराई सी डोली, पत्तों-शाखों में खोज रही थी भोली. दम घुटता-सा था और,दृष्टि धुँधलाई, पगलाई सी वह कुछ भी समझ न पाई. सुध-बुध बिसार वह पागल सी चीखी थी, 'मेरे बच्चे देते क्यों नहीं दिखाई? ' 'तुम कहाँ छि पगए, मेरे प्यारे बच्चों? ओ,प्राणों के आधार दुलारे बच्चों!’
दम फूल उठा लड़खड़ा गई इतने में, फिर करने लगी पुकार आर्त से स्वर में - 'ओ,मेरे बच्चों कहाँ गए हो? आओ, सुकुमार पंख हैं अभी दूर मत जाओ. ओ,लाल कहाँ हो कुछ तो मुख से बोलो, कोई तो मुझे बताओ, रे मुँह खोलो.'
चोंचें बाये वे लुंज-पुंज से हो कर, थे पंख-रहित से पिंड पड़े धरती पर.. 'मेरे छोनो.ऐसे क्यों वहाँ पड़े हो? सब ओर निहारो, जल्दी उठो खड़े हो.'
हरियाली पीली पड़ कर मुरझाई थी, विषगंध दिशा में, काली परछाईं थी. सब जीव-जगत ज्यों पड़ा हुआ ठंडा हो, स्तब्ध हवा, पर्वत जैसे नंगा हो..
फिर भीषण रव भर फटा आग का गोला, औ' धुआँ-धुआँ सब ओर चटकता शोला. ज्यों दिग्दिगंत तक तपती राख भरी हो ज्यों सृष्टि समूची सहमी हो सिहरी हो! पर जले, फफोले सा तन भान गँवाया रुँध गई साँस, चकरी सी डोली काया. आ गिरी कपोती मृत शिशुओं के ऊपर, घाटी पर्वत नभ धूसर धूसर धूसर.
दूषित नभ, पानी ज़हर कि माटी बंजर. ऋतुओं का चक्र घूमता रहता फिर भी सदियाँ बीतीं तिनका न उगा उस भू पर!
(एक गहरी साँस, कुछ देर चुप्पी ) लौट चलो रे बंधु, कि अब यह सहन नहीं होता है, वर्तमान में आकर भी मन सिसक-सिसक रोता है. मिला कौन सुख उनके प्रेम-नीड़ में आग लगा कर? चैन मिला क्या उस नन्दन-वन को श्मशान बना कर?
वह कपोत खोजता नीड़ अब भी उड़ रहा गगन में, शान्ति-शान्ति की टेर लगाता वन में, जन में, मन में.
इति
The Poet
प्रतिभा सक्सेना
Pratibha Saxena
Dr. Pratibha Saxena holds a distinct and vital place in contemporary Hindi literature. Her work connects the rigorous intellectual demands of academia with the sensitive realities of human relationships. Born on February 9, 1938, in Madhya Pradesh, her life path took her from the lecture halls of Kanpur, where she worked as an educator, to a diasporic existence in the United States. This geographical shift is highly visible in her diverse literary output, which includes poetry, short stories, and satire. In collections like Uttar Katha and Seema Ke Bandhan, she examines the modern domestic sphere. She highlights the subtle constraints placed upon women and the shifting dynamics of family life with deep psychological insight. Her language carries a quiet and confident thoughtfulness that never shouts but still commands complete attention. Saxena has spent decades enriching Hindi literature, demonstrating that a writer can remain deeply rooted in their native culture while living far from home.

Paired Painting
Battle Scene
In the cool, misty foothills of the Himalayas, master painters of the Pahari school captured the thundering chaos and majestic spectacle of epic warfare. This panoramic battle folio is a symphony of motion, where rows of royal elephants bearing golden howdahs advance through a sea of foot soldiers, while cavaliers clash in swirling clouds of dust. The artist imbues the scene with an almost musical rhythm, balancing the brutal intensity of combat with the refined pageantry of royal leadership. Every delicate brushstroke honors the courage of ancient warriors, immortalizing a timeless drama of duty, honor, and destiny.
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