
माँ के पँख नहीं होते
Man Ke Pankh Nahin Hote
Divik Ramesh
9 verses · ~21 lines · 1 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

4 verses · ~1 min
यवनिकाओं खिंचे रहस्यलोक में ढल रहीं अजानी आकृति की निरंतर उठा-पटक, जीवन खींचता विकसता अंकुर कितनी भूमिकाओं का निर्वाह एक साथ नए जन्म की पूर्व-पीठिका .
कितने विषम होते हैं जन्म के क्षण रक्त और स्वेद की कीच दुसह वेदना, धरती फोड़ बाहर आने को आकुल अंकुर और फूटने की पीड़ा से व्याकुल धरती!
पीड़ा की नीली लहरें झटके दे दे कर मरोड़ती, तीक्ष्ण नखों से खरोंच डालती हैं तन बार-बार प्राणों को खींचती -सी! फूँकने में नए प्राण, मृत्यु को भोगती जननी की श्वासें श्लथ, लथपथ .
देख कर आँचल का फूल सारी पीड़ाएँ भूल नेह-पगी अमिय-धार से सींचती, सहज प्रसन्न .परिपूर्ण, आत्म-तुष्ट जैसे कोई साखी या ऋचा प्रकृति के छंद में जाग उठे!
इति

Paired Painting
Ganga and Bhishma
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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Janma carries.