№ MMXXVI

RACHNA · A LIVING ARCHIVE

Rachna by M.

Loading the archive

MM · XXVI

Canvas
Ganga and Bhishma

Karuna

जन्म

Janma

Pratibha Saxena
1 min read 4 versesजन्मbirthपीड़ा

4 verses · ~1 min

यवनिकाओं खिंचे रहस्यलोक में ढल रहीं अजानी आकृति की निरंतर उठा-पटक, जीवन खींचता विकसता अंकुर कितनी भूमिकाओं का निर्वाह एक साथ नए जन्म की पूर्व-पीठिका .

कितने विषम होते हैं जन्म के क्षण रक्त और स्वेद की कीच दुसह वेदना, धरती फोड़ बाहर आने को आकुल अंकुर और फूटने की पीड़ा से व्याकुल धरती!

पीड़ा की नीली लहरें झटके दे दे कर मरोड़ती, तीक्ष्ण नखों से खरोंच डालती हैं तन बार-बार प्राणों को खींचती -सी! फूँकने में नए प्राण, मृत्यु को भोगती जननी की श्वासें श्लथ, लथपथ .

देख कर आँचल का फूल सारी पीड़ाएँ भूल नेह-पगी अमिय-धार से सींचती, सहज प्रसन्न .परिपूर्ण, आत्म-तुष्ट जैसे कोई साखी या ऋचा प्रकृति के छंद में जाग उठे!

इति

Pratibha Saxena

The Poet

प्रतिभा सक्सेना

Pratibha Saxena

Ganga and Bhishma

Paired Painting

Ganga and Bhishma

Open the viewer →

If this held you

Four more, in the same key.

Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Janma carries.