
एक किरन भोर की
Ek Kiran Bhor Ki
Buddhinath Mishra
3 verses · ~8 lines · 1 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

1 verses · ~2 min
निकल आओ कमरे से बाहर ज़रा , इस खुली अगहनी धूप में बैठ लें! खींच लें प्लास्टिकी कुर्सियाँ ,इस तरफ़ साथ चलती सड़क का किनारा मिले! खिड़कियाँ कुछ खुली हैं घरों की अभी , झाँकती लड़कियों का नज़ारा मिले! दूध के दाँत आगे के टूटे हुये झर रही हैं हँसी की फुहारें बिखर , फूलवाली नई फ़्राक पहने हुये एक बच्ची चली आ रही है इधर! हाथ पकड़े हुये भाई थोड़ा बड़ा , दूसरे हाथ से है सम्हाले हुये पेट से खिसक आता पजामा ज़रा! वाह, ठेले पे ,कैसी हरी औ' भरी ताज़ी टूटी हुई वो मटर की फली! हींग-ज़ीरा हरी मिर्च से छौंककर , साथ में शाम की चाय अदरक डली! आओ , छीलें मटर भी यहीं बैठ कर और छिलके उधर डाल दें गाय को! कोई पूछे कि क्या हो रहा है, कहें , 'देख ले आप ही ,पूछता काय को?' धूप जब तक इधर से उधर तक चले हम भी अपनी वहीं कुर्सियाँ खींच लें! आज टालो नहाना ,जरूरी नहीं , एक दिन ताश की गड्डियाँ फेंट लें!
इति

Paired Painting
Game of Pachisi
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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Halka-Phulka carries.