
मातृ वंदना
Matri Vandana
Suryakant Tripathi 'Nirala'
3 verses · ~11 lines · 1 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

Veera
Khoon Ki Holi Jo Kheli
Suryakant Tripathi 'Nirala'7 verses · ~2 min
युवकजनों की है जान; ख़ून की होली जो खेली । पाया है लोगों में मान, ख़ून की होली जो खेली ।
रँग गये जैसे पलाश; कुसुम किंशुक के, सुहाए, कोकनद के पाए प्राण, ख़ून की होली जो खेली ।
निकले क्या कोंपल लाल, फाग की आग लगी है, फागुन की टेढ़ी तान, ख़ून की होली जो खेली ।
खुल गई गीतों की रात, किरन उतरी है प्रात की;- हाथ कुसुम-वरदान, ख़ून की होली जो खेली ।
आई सुवेश बहार, आम-लीची की मंजरी; कटहल की अरघान, ख़ून की होली जो खेली ।
विकच हुए कचनार, हार पड़े अमलतास के; पाटल-होठों मुसकान, ख़ून की होली जो खेली ।
यह कविता निराला जी ने 1946 के स्वाधीनता संग्राम में विद्यार्थियों के देश-प्रेम पर लिखी थी और यह गया से प्रकाशित साप्ताहिक 'उषा' के होलिकांक में मार्च 1946 में प्रकाशित हुई ।
इति
The Poet
Suryakant Tripathi 'Nirala'

Paired Painting
Battle of Haldighati
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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Khoon Ki Holi Jo Kheli carries.