
फूले कदंब
Phule Kadamb
Nagarjun
2 verses · ~5 lines · 1 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

Shringara
Badal Ko Ghirte Dekha Hai
Nagarjun12 verses · ~4 min
अमल धवल गिरि के शिखरों पर, बादल को घिरते देखा है।
छोटे-छोटे मोती जैसे उसके शीतल तुहिन कणों को, मानसरोवर के उन स्वर्णिम कमलों पर गिरते देखा है,
बादल को घिरते देखा है।
तुंग हिमालय के कंधों पर छोटी बड़ी कई झीलें हैं, उनके श्यामल नील सलिल में समतल देशों से आ-आकर पावस की उमस से आकुल तिक्त-मधुर विषतंतु खोजते हंसों को तिरते देखा है।
बादल को घिरते देखा है।
ऋतु वसंत का सुप्रभात था मंद-मंद था अनिल बह रहा बालारुण की मृदु किरणें थीं अगल-बगल स्वर्णाभ शिखर थे एक-दूसरे से विरहित हो अलग-अलग रहकर ही जिनको सारी रात बितानी होती, निशा-काल से चिर-अभिशापित बेबस उस चकवा-चकई का बंद हुआ क्रंदन, फिर उनमें उस महान् सरवर के तीरे शैवालों की हरी दरी पर प्रणय-कलह छिड़ते देखा है।
बादल को घिरते देखा है।
शत-सहस्र फुट ऊँचाई पर दुर्गम बर्फानी घाटी में अलख नाभि से उठने वाले निज के ही उन्मादक परिमल- के पीछे धावित हो-होकर तरल-तरुण कस्तूरी मृग को अपने पर चिढ़ते देखा है,
बादल को घिरते देखा है।
कहाँ गय धनपति कुबेर वह कहाँ गई उसकी वह अलका नहीं ठिकाना कालिदास के व्योम-प्रवाही गंगाजल का, ढूँढ़ा बहुत किन्तु लगा क्या मेघदूत का पता कहीं पर, कौन बताए वह छायामय बरस पड़ा होगा न यहीं पर, जाने दो वह कवि-कल्पित था, मैंने तो भीषण जाड़ों में नभ-चुंबी कैलाश शीर्ष पर, महामेघ को झंझानिल से गरज-गरज भिड़ते देखा है, बादल को घिरते देखा है।
शत-शत निर्झर-निर्झरणी कल मुखरित देवदारु कनन में, शोणित धवल भोज पत्रों से छाई हुई कुटी के भीतर, रंग-बिरंगे और सुगंधित फूलों की कुंतल को साजे, इंद्रनील की माला डाले शंख-सरीखे सुघड़ गलों में, कानों में कुवलय लटकाए, शतदल लाल कमल वेणी में, रजत-रचित मणि खचित कलामय पान पात्र द्राक्षासव पूरित रखे सामने अपने-अपने लोहित चंदन की त्रिपटी पर, नरम निदाग बाल कस्तूरी मृगछालों पर पलथी मारे मदिरारुण आखों वाले उन उन्मद किन्नर-किन्नरियों की मृदुल मनोरम अँगुलियों को वंशी पर फिरते देखा है।
बादल को घिरते देखा है।
इति

Paired Painting
Shiva and Parvati as Kirata and Kirati
This profound chromolithograph captures Lord Shiva and Goddess Parvati disguised as Kirata and Kirati, tribal hunters of the Himalayan forests. The scene echoes the timeless epic narrative of the Kiratarjuniya, where the supreme deities test the might, humility, and devotion of the Pandava prince Arjuna. Raja Ravi Varma masterfully blends European academic realism with deeply sacred Indian iconography. Shiva stands tall and commanding, adorned with the crescent moon in his matted locks, the trident, and a tiger skin, embodying fierce ascetic power. Beside him, Parvati radiates gentle grace, adorned with peacock feathers and holding a bow, perfectly assuming the likeness of a mountain huntress. Through this work, the divine couple transcends distant temples, walking intimately among the rugged earthly terrain they lovingly sustain.
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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Badal Ko Ghirte Dekha Hai carries.