№ MMXXVI

RACHNA · A LIVING ARCHIVE

Rachna by M.

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MM · XXVI

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Mother and Child

Shringara

सहयात्रा के साठ बरस

Sahayatra Ke Saath Baras

Ramdarash Mishra
1 min read 6 versesसाठ बरसरोटीसफ़र

6 verses · ~1 min

साथ-साथ चलते जाना कब साठ बरस बीते!

एक हाथ में थी कविता, दूजे में थी रोटी हम तानते रहे दोनों की लय छोटी-छोटी चलते रहे सफ़र में हम यों ही खाते-पीते!

जब आया जलजला, पाँव काँपने लगे डर से बढ़कर थाम लिया हमने इक-दूजे को कर से कितना कुछ टूटा-फूटा, पर हम न कभी रीते!

छोटे-छोटे सुख-पंछी फड़काते थे पाँखें छोटे-छोटे सपनों से भर आती थीं आँखें गिरे-पड़े, कुछ हारे-से भी, पर आख़िर जीते!

ख़ुद के गिरने पर उठकर तुम कितना हँसती थीं पर मेरी छोटी-सी डगमग तुमको डँसती थी भर आते थे जीवन-रस से, पल विष-से तीते!

जब-जब दूर हुआ घर से, तनहा हो घबराया तब-तब लगा मुझे, कोई स्वर तुम जैसा आया- घबराना मत तनहाई से, मैं तो हूँ मीते!

इति

Ramdarash Mishra

The Poet

रामदरश मिश्र

Ramdarash Mishra

Mother and Child

Paired Painting

Mother and Child

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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Sahayatra Ke Saath Baras carries.