№ MMXXVI

RACHNA · A LIVING ARCHIVE

Rachna by M.

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MM · XXVI

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Arjuna and Ulupi

Karuna

एक बार और जाल फेंक रे मछेरे

Ek Baar Aur Jaal Phenk Re Machhere

Buddhinath Mishra
1 min read 1 versesप्रयासeffortआशा

1 verses · ~1 min

एक बार और जाल फेंक रे मछेरे, जाने किस मछली में बंधन की चाह हो! सपनों की ओस गूंथती कुश की नोक है, हर दर्पण में उभरा एक दिवालोक है; रेत के घरौंदों में सीप के बसेरे, इस अंधेर में कैसे नेह का निबाह हो! उनका मन आज हो गया पुरइन पात है, भिगो नहीं पाती यह पूरी बरसात है; चंदा के इर्द-गिर्द मेघों के घेरे, ऐसे में क्यों न कोई मौसमी गुनाह हो! गूंजती गुफाओं में पिछली सौगंध है, हर चारे में कोई चुंबकीय गंध है; कैसे दे हंस झील के अनंत फेरे, पग-पग पर लहरें जब बांध रही छांह हो! कुंकुम-सी निखरी कुछ भोरहरी लाज है, बंसी की डोर बहुत कांप रही आज है; यों ही ना तोड़ अभी बीन रे संपेरे, जाने किस नागिन में प्रीत का उछाह हो!

इति

Buddhinath Mishra

The Poet

बुद्धिनाथ मिश्र

Buddhinath Mishra

Arjuna and Ulupi

Paired Painting

Arjuna and Ulupi

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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Ek Baar Aur Jaal Phenk Re Machhere carries.