
मेंहदी सिसकती रही
Mehndi Sisakti Rahi
Rakesh Khandelwal
8 verses · ~36 lines · 2 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

16 verses · ~6 min
हम हुए अजनबी खुद से भी आपकी सिर्फ तस्वीर ही बस बदलती रही
आईने की परेशानियों का सबब क्या मुखौटे थे मेरे या मैं खुद ही था अक्स जिनको दिखाता रहा आईना एक कोई भी उनमें से मेरा न था अक्स के अक्स का अक्स महसूसती अपने ही अक्स में आईने की नज़र बिंब कितने प्रतीक्षित रहे मोड़ पर ख़त्म हो जाए असमंजसों का सफ़र
इक ऊहापोह में थी उलझ रह गई रश्मियां बर्फ जैसे पिघलती रही
गांव की चंद पगडंडि़यों के सिरे आंख मलते हुए स्वप्न बुनते रहे फड़फड़ाते हुए पृष्ठ इतिहास के इक भविष्यत को रंगीन करते रहे काल के चक्र से हाथ की रेख का न समन्वय हुआ एक पल के लिए धागे बांधे सदा बरगदों के तले मन्नतों के मगर जल न पाए दिए
औ' समय की गुफ़ा में किरण आस की रास्ता ढूंढ़ती बस भटकती रही
हम अभी तक खड़े हैं उसी मोड़ पर तुम जहां थे रुके एक पल के लिए मुट्ठियों में हैं अवशेष, शपथों के जो थीं उठाईं गई उम्र् भर के लिए दृष्टि का मेरा आकाश सिमटा हुआ कुछ न दिख पाता इक दायरे के परे दीप थाली में नज़रें चुराता रहा मंत्र भी प्राथर्ना के हैं सहमे डरे
शेष बाकी नहीं गर्द् भी राह में सीटियां बस हवाओं की बजती रहीं
नित बदलते हुए विश्व चलता रहा कोई ठहराव गति में नहीं आ सका जि़दगी दौड़ते दौड़ते चल रही एक पल भी नहीं हाथ में आ सका भावनाएं बिछी रह गईं राह सी और संबंध पहियों से चलते रहे आस्था ने उगाए जो सूरज सभी भोर को सांझ करके निगलते रहे
आप भी साथ बदलें हमारे यहीं साध बस एक सीने में पलती रही
हम बदल कर हुए अजनबी आपकी सिर्फ तस्वीर ही बस बदलती रही तुमने जिसको सुना गूंज थी मौन की जो कि उजड़ी बहारों में छुप रह गई आगमन की प्रतीक्षा मदन की लिए कोंपलें आंख खोले हुए रह गईं टूटे शीशे की आवाज संगीत बन लहिरयों पे हवा की बिखरती रही गंध जो संदली थी हवा में उड़ी पेड़ की पित्तयों में सिमटती रही
इक नज़र में न बदली, मगर दूसरी में वो तस्वीर फिर भी बदलती रही
पत्थरों में उगी नागफ़िनयां रहीं आप भर्म से उन्हें फूल कहते रहे स्रोत सपनों के खंडहर से निकले हुए नैन के निझर्रों से टपकते रहे आईने पर जमी गर्द् में आईना बिंब अपना नहीं देख पाया कभी हां नज़र के भरम में उलझते हुए तुम रहे, वे रहे और रहे हैं सभी एक वह मिथ्या भर्म तोड़ने के लिए कोशिशें लेखनी नित्य करती रही
हम बदल कर हुए अजनबी आपकी सिर्फ् तस्वीर ही इक बदलती रही
रात जैसे तो मन के अंधेरे रहे और चेतन को संशय हैं घेरे रहे हो गईं बंद पत्तों की जब जालियां रोशनी क्या छनी और बरसात क्या मृग तो तृष्णा के पीछे भटकता रहा और ये सत्य मन में अटकता रहा क्यों छलावों में लिपटी रही जि़दगी स्वप्न क्यों हर कली सा चटकता रहा
कौन सा है निमित साथ लेकर जिसे उम्र् धड़कन से बंध कर ढुलकती रही
हम हुए अजनबी खुद से भी आपकी सिर्फ् तस्वीर ही इक बदलती रही
इति
The Poet
Rakesh Khandelwal
Rakesh Khandelwal occupies a unique and vital space in contemporary literature as a leading voice of the Indian diaspora. Born in 1953 in Bharatpur, Rajasthan, he later settled in the United States, carrying the cultural memory and linguistic wealth of his homeland with him. He masterfully navigates the emotional terrain of the migrant experience. Through collections like Amavas Ka Chand and Andheri Raat Ka Suraj, Khandelwal articulates the quiet ache of physical distance alongside an unyielding connection to Indian roots. His poetry does not merely dwell on nostalgia. He possesses a brilliant command of satire and humor, capturing the everyday ironies of modern life in poems that resonate deeply with both domestic and international audiences. By actively nurturing Hindi literary circles abroad, he has ensured that the language continues to thrive far beyond its geographical borders. He stands as a testament to the fact that true poetic sensibility is not bound by geography, but resides permanently in the soul.

Paired Painting
Karna Lifting the Chariot Wheel
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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Tasveer Badalti Rahi carries.