№ MMXXVI

RACHNA · A LIVING ARCHIVE

Rachna by M.

Loading the archive

MM · XXVI

Canvas
Saraswati

Shanta

शब्द की महिमा

Shabd Ki Mahima

Kabir
5 min read 20 versesशब्दwordकबीर

20 verses · ~5 min

शब्द दुरिया न दुरै, कहूँ जो ढोल बजाय | जो जन होवै जौहोरी, लेहैं सीस चढ़ाय ||

ढोल बजाकर कहता हूँ निर्णय - वचन किसी के छिपाने (निन्दा उपहास करने) से नहीं छिपते | जो विवेकी - पारखी होगा, वह निर्णय - वचनों को शिरोधार्य कर लेगा |

एक शब्द सुख खानि है, एक शब्द दुःखराखि है | एक शब्द बन्धन कटे, एक शब्द गल फंसि ||

समता के शब्द सुख की खान है, और विषमता के शब्द दुखो की ढेरी है | निर्णय के शब्दो से विषय - बन्धन कटते हैं, और मोह - माया के शब्द गले की फांसी हो जाते हैं |

सीखै सुनै विचार ले, ताहि शब्द सुख देय | बिना समझै शब्द गहै, कहु न लाहा लेय ||

जो निर्णय शब्दो को सुनता, सीखता और विचारता है, उसको शब्द सुख देते हैं | यदि बिना समझे कोई शब्द रट ले, तो कोई लाभ नहीं पाता |

हरिजन सोई जानिये, जिहा कहैं न मार | आठ पहर चितवर रहै, गुरु का ज्ञान विचार ||

हरि - जन उसी को जानो जो अपनी जीभ से भी नहीं कहता कि "मारो" | बल्कि आठों पहर गुरु के ज्ञान - विचार ही में मन रखता है |

कुटिल वचन सबते बुरा, जारि करे सब छार | साधु वचन जल रूप है, बरसै अमृत धार ||

टेड़े वचन सबसे बुरे होते हैं, वे जलाकर राख कर देते हैं | परन्तु सन्तो के वचन शीतल जलमय हैं, जो अमृत की धारा बनकर बरसते हैं |

खोद खाद धरती सहै, काट कूट बनराय |कुटिल वचन साधु सहै, और से सहा न जाय ||

खोद - खाद प्रथ्वी सहती है, काट - कूट जंगल सहता है | कठोर वचन सन्त सहते हैं, किसी और से सहा नहीं जा सकता |

मुख आवै सोई कहै, बोलै नहीं विचार | हते पराई आत्मा, जीभ बाँधि तरवार ||

कितने ही मनुष्य जो मुख में आया, बिना विचारे बोलते जी जाते हैं | ये लोग परायी आत्मा को दुःख देते रहते है अपने जिव्हा में कठोर वचनरूपी तलवार बांधकर |

जंत्र - मंत्र सब झूठ है, मत भरमो जग कोय | सार शब्द जानै बिना, कागा हंस न होय |

टोने - टोटके, यंत्र - मंत्र सब झूठ हैं, इनमे कोई मत फंसो | निर्णय - वचनों के ज्ञान बिना, कौवा हंस नहीं होता |

शब्द जु ऐसा बोलिये, मन का आपा खोय | औरन को शीतल करे, आपन को सुख होय ||

शरीर का अहंकार छोड़कर वचन उच्चारे | इसमें आपको शीतलता मिलेगी, सुनने वाले को भी सुख प्राप्त होगो |

कागा काको धन हरै, कोयल काको देत | मीठा शब्द सुनाय को, जग अपनो करि लेत ||

कौवा किसका धन हरण करता है, और कोयल किसको क्या देती है? केवल मीठा शब्द सुनाकर जग को अपना बाना लेती है |

इति

Kabir

The Poet

कबीर

Kabir

1398 · 1518

To speak of Kabir within the ordinary parameters of literary biography is almost impossible. Born in the fifteenth century to a Muslim weaver's family in the sacred Hindu city of Banaras, he became a voice that refused to be domesticated by any temple, mosque, or scholarly apparatus. Kabir claimed no scripture, no caste, and no sacred language as his exclusive property. He stood at the loom of reality and wove his dohas (devastating two-line couplets) from the raw thread of direct spiritual encounter. His critique was not merely religious but civilizational. He asked with the serene ferocity of an awakened mind why human beings had chosen the architecture of division over the open sky of the divine. Centuries have passed, empires have crumbled, and languages have shifted. Yet, Kabir's couplets are still recited in village squares and debated in universities today. He requires no temple because he built one inside language itself. He is the conscience of the Indian soul.

Saraswati

Paired Painting

Saraswati

Open the viewer →

If this held you

Four more, in the same key.

Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Shabd Ki Mahima carries.