№ MMXXVI

RACHNA · A LIVING ARCHIVE

Rachna by M.

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MM · XXVI

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Vyasa Dictating the Mahabharata to Ganesha

Shanta

दूध के दाँत

Dudh Ke Dant

Geet Chaturvedi
2 min read 8 versesबचपनchildhoodस्मृति

8 verses · ~2 min

देह का कपड़ा देह की गरमी से देह पर ही सूखता है - कृष्णनाथ

मैंने जिन-जिन जगहों पे गाड़े थे अपने दूध के दांत वहां अब बड़े-खड़े पेड़ लहलहाते हैं

दूध का सफ़ेद तनों के कत्थई और पत्तों के हरे में लौटता है

जैसे लौटकर आता है कर्मा जैसे लौटकर आता है प्रेम जैसे विस्मृति में भी लौटकर आती है कहीं सुनी गई कोई धुन बचपन की मासूमियत बुढ़ापे के सन्निपात में लौटकर आती है

भीतर किसी खोह में छुपी रहती है तमाम मौन के बाद भी लौट आने को तत्पर रहती है हिंसा

लोगों का मन खोलकर देखने की सुविधा मिले तो हर कोई विश्वासघाती निकले सच तो यह है कि अनुवाद में वफ़ादारी कहीं आसान है किसी गूढ़ार्थ के अनुवाद में बेवफ़ाई हो जाए तो नकचढ़ी कविता नाता नहीं तोड़ लेती

मेरे भीतर पुरखों जैसी शांति है समकालीनों जैसा भय लताओं की तरह चढ़ता है अफ़सोस मेरे बदन पर अधपके अमरूद पेड़ से झरते हैं

मैं जो लिखता हूँ वह एक बच्चे की अंजुलियों से रिसता हुआ पानी है

इति

Geet Chaturvedi

The Poet

गीत चतुर्वेदी

Geet Chaturvedi

Vyasa Dictating the Mahabharata to Ganesha

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Vyasa Dictating the Mahabharata to Ganesha

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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Dudh Ke Dant carries.