
फिर घर
Phir Ghar
Ashok Vajpeyi
6 verses · ~15 lines · 1 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

10 verses · ~3 min
मैं उठा और उठता चला गया जैसे कि तूफान! जा लगा उस सीने से बेहद करीबी अपने सीने से
जो था ही नहीं, कहीं मेरे वज़ूद सा । मैं शान्त हुआ और खो गया हालाँकि था ही क्या खोने को पर खो गया
ठीक बहला दिए गए किसी बच्चे की जिद-सा । मैंने देखा आकाश मुझमें डूब गया था पूरा का पूरा । मैं मारता रहा हाथ-पाँव
लेता रहा आकाश हिलोरे । मैं उठा और चढ़ बैठा आकाश के कंधों पर । मुझे साँस मिली जॆसे आकाश मेरा पिता हो ।
मैंने याद किया बहुत याद किया पृथ्वी को जो गायब थी मेरे पैरों से । यूँ मिली ही कब थी वह ।
मैंने याद किया महज याद करने के लिए ऒर लूटता रहा सुख औपचारिकता का और सताता रहा याद को, रुलाता रहा ।
कितना शैतान था न मैं! बहुत प्यार से देखा मुझे याद ने लाड़ उमड़ आया था उसका उसने मुझे छुआ ।
सामने वाले वृक्ष पर बैठी मेरी दिवंगत माँ जाने कब से निहार रही थी यह किस्सा । नहीं जानता
मैं कब चटका और अपने से दूर हो गया और बहुत करीब अपने पास आ गया । जाने क्या गुनगुनाता रहा देर तक बैठा अपनी टाट बिछी पृथ्वी की गोद में ।
तुम कहाँ हो पृथ्वी कहाँ किस टहनी पर अटकी हो वृक्ष की! आओ और मेरे पाँवों को जमीन दो ओ माँ ।
इति

Paired Painting
Ganga and Bhishma
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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Yaad Aai Prithvi carries.