№ MMXXVI

RACHNA · A LIVING ARCHIVE

Rachna by M.

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MM · XXVI

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Ganga and Bhishma

Karuna

याद आई पृथ्वी

Yaad Aai Prithvi

Divik Ramesh
3 min read 10 versesपृथ्वीearthमाँ

10 verses · ~3 min

मैं उठा और उठता चला गया जैसे कि तूफान! जा लगा उस सीने से बेहद करीबी अपने सीने से

जो था ही नहीं, कहीं मेरे वज़ूद सा । मैं शान्त हुआ और खो गया हालाँकि था ही क्या खोने को पर खो गया

ठीक बहला दिए गए किसी बच्चे की जिद-सा । मैंने देखा आकाश मुझमें डूब गया था पूरा का पूरा । मैं मारता रहा हाथ-पाँव

लेता रहा आकाश हिलोरे । मैं उठा और चढ़ बैठा आकाश के कंधों पर । मुझे साँस मिली जॆसे आकाश मेरा पिता हो ।

मैंने याद किया बहुत याद किया पृथ्वी को जो गायब थी मेरे पैरों से । यूँ मिली ही कब थी वह ।

मैंने याद किया महज याद करने के लिए ऒर लूटता रहा सुख औपचारिकता का और सताता रहा याद को, रुलाता रहा ।

कितना शैतान था न मैं! बहुत प्यार से देखा मुझे याद ने लाड़ उमड़ आया था उसका उसने मुझे छुआ ।

सामने वाले वृक्ष पर बैठी मेरी दिवंगत माँ जाने कब से निहार रही थी यह किस्सा । नहीं जानता

मैं कब चटका और अपने से दूर हो गया और बहुत करीब अपने पास आ गया । जाने क्या गुनगुनाता रहा देर तक बैठा अपनी टाट बिछी पृथ्वी की गोद में ।

तुम कहाँ हो पृथ्वी कहाँ किस टहनी पर अटकी हो वृक्ष की! आओ और मेरे पाँवों को जमीन दो ओ माँ ।

इति

Divik Ramesh

The Poet

दिविक रमेश

Divik Ramesh

Ganga and Bhishma

Paired Painting

Ganga and Bhishma

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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Yaad Aai Prithvi carries.