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Rama Breaks the Bow

ShantaAdvanced

प्रश्नचिह्न

Prashnachihna

Bharat Bhushan Agarwal
3 min read 8 versesDestruction

8 verses · ~3 min

मूर्ति तो हटी, परंतु तम में भटकती हुई अनगिनती आँखों को जिसने नई दृष्टि दी, खोल दिए सम्मुख नए क्षितिज, नूतन आलोक से मंडित की सारी भूमि- जन-मन के मुक्तिदूत उस देवता के प्रति, श्रद्धा से प्रेरित हो, समवेत जन ने, प्रतिमा प्रतिष्ठित की अपने सम्मुख विराट!

अपने हृदयों में बसी ऊर्ध्वबाहु कल्पना, पत्थर पर आँकी अति यत्न से! मूर्ति वह अद्वितीय, महाकाय, शीश पर जिसके हाथ धरते थे मेघराज, चरणों में जिसके जन झुकते थे भक्ति से, अंजलि के फूल-भार के समान, अधरों पर जिसके थी मंत्रमयी मुस्कान, उल्लसित करती थी लोक-प्राण!

यों ही दिन बीत चले, और वह मूर्ति- दिन-पर-दिन, स्वयमेव, मानो और बड़ी, और बड़ी होती चली गई! जड़ प्रतिमा में बंद यह रहस्य, यह जादू, कितने समझ सके, कितने न समझे- यह कहना कठिन है।

क्योंकि उसे पूजा सब जन ने, भूलकर एक छोटा सत्य यह, पत्थर न घटता है, न बढ़ता है रंच मात्र, मूर्ति बड़ी होती जा रही थी क्योंकि वे स्वयं छोटे होते जाते थे, भूलकर एक बड़ा सत्य यह, मूर्ति की विराटता ने ढँक लिए वे क्षितिज, देवता ने एक-एक करके जो खोले थे।

आखिर में एक दिन ऐसा भी आ पहुँचा, मूर्ति जब बन चुकी थी आसमान, और जन बन चुके थे चूहों-से, मेंढक-से, छोटे-ओछे, नगण्य! क्षितिजों के सूर्य की जगह भी वह मुस्कान, जिसमें नहीं था कोई अपना आलोक-स्रोत! होकर वे तम में बंद, फिर छटपटाने लगे!

तभी कुछ साहसी जनों ने बढ़ अपनी लघुता का ज्ञान दिया हर व्यक्ति को। और फिर, शून्य बन जाने के भय से अनुप्राणित हो- समवेत जन ने- अपने ही हाथों से गढ़ी हुई देवता की मूर्ति वह तोड़ डाली- छैनी से, टाँकी से, हथौड़ी से, जिसको जो मिला उसी शस्त्र से, गढ़ते समय भी ऐसा उत्साह कब था?

देखा तब सबने आश्चर्य से: प्रतिमा की ओट में जो रमी रही एक युग, उनकी वे दृष्टियाँ अब असमर्थ थीं, कि सह सके सहज प्रकाश आसमान का! और फिर सबने यह देखा असमंजस से: मूर्ति तो हटी, परंतु सामने डटा था प्रश्नचिह्न यह: मूँद लें वे आँखें या कि प्रतिमा गढ़ें नई?

हर अंधी श्रद्धा की परिणति है यह खंडन! हर खंडित मूर्ति का प्रसाद है यह प्रश्नचिह्न!

इति

Bharat Bhushan Agarwal

The Poet

भारत भूषण अग्रवाल

Bharat Bhushan Agarwal

Rama Breaks the Bow

Paired Painting

Rama Breaks the Bow

This profound work captures a pivotal moment of destiny from the Ramayana, where the youthful Prince Rama draws the divine bow of Shiva. In this sacred instant, the tension of the string mirrors the weight of dharma, as Rama proves his celestial nature to the gathered assembly. Raja Ravi Varma masterfully imbues the scene with a sense of quiet grace, anchoring the divine within a recognizable, human architecture, and inviting the viewer to witness the transition from human prince to the prophesied hero of the ages.

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