№ MMXXVI

RACHNA · A LIVING ARCHIVE

Rachna by M.

Loading the archive

MM · XXVI

Canvas
Usha Dreaming

Shringara

स्मृतिकण

Smritikan

Bhagwati Charan Verma
1 min read 3 versesविरहseparationयाद

3 verses · ~1 min

क्या जाग रही होगी तुम भी? निष्ठुर-सी आधी रात प्रिये! अपना यह व्यापक अंधकार, मेरे सूने-से मानस में, बरबस भर देतीं बार-बार; मेरी पीडाएँ एक-एक, हैं बदल रहीं करवटें विकल; किस आशंका की विसुध आह! इन सपनों को कर गई पार

मैं बेचैनी में तडप रहा; क्या जाग रही होगी तुम भी? अपने सुख-दुख से पीडित जग, निश्चिंत पडा है शयित-शांत, मैं अपने सुख-दुख को तुममें, हूँ ढूँढ रहा विक्षिप्त-भ्रांत; यदि एक साँस बन उड सकता, यदि हो सकता वैसा अदृश्य

यदि सुमुखि तुम्हारे सिरहाने, मैं आ सकता आकुल अशांत पर नहीं, बँधा सीमाओं से, मैं सिसक रहा हूँ मौन विवश; मैं पूछ रहा हूँ बस इतना- भर कर नयनों में सजल याद, क्या जाग रही होगी तुम भी?

इति

Bhagwati Charan Verma

The Poet

भगवतीचरण वर्मा

Bhagwati Charan Verma

Usha Dreaming

Paired Painting

Usha Dreaming

Open the viewer →

If this held you

Four more, in the same key.

Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Smritikan carries.