
कभी यूँ मिलें कोई मसलेहत, कोई ख़ौफ़ दिल में ज़रा न हो
Kabhi Yun Milen Koi Masalehat, Koi Khauf Dil Me Zara Na Ho
Bashir Badr
6 verses · ~15 lines · 1 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

Shringara
Kabhi Yun Bhi Aa Meri Aankh Mein Ke Meri Nazar Ko Khabar Na Ho
Bashir Badr8 verses · ~2 min
कभी यूँ भी आ मेरी आँख में के मेरी नज़र को ख़बर न हो मुझे एक रात नवाज़[1] दे मगर उसके बाद सहर न हो
वो बड़ा रहीम-ओ-करीम है मुझे ये सिफ़त[2] भी अता[3] करे तुझे भूलने की दुआ करूँ तो दुआ में मेरी असर न हो
मेरे बाज़ुओं में थकी-थकी, अभी महव-ए-ख़्वाब[4] है चांदनी न उठे सितारों की पालकी, अभी आहटों का गुज़र न हो
ये ग़ज़ल कि जैसे हिरन की आँखों में पिछली रात की चांदनी न बुझे ख़राबे की रोशनी, कभी बेचिराग़ ये घर न हो
वो फ़िराक़[5] हो या विसाल[6] हो, तेरी याद महकेगी एक दिन वो गुलाब बन के खिलेगा क्या, जो चिराग़ बन के जला न हो
कभी धूप दे, कभी बदलियाँ, दिल-ओ-जाँ से दोनों क़ुबूल हैं मगर उस नगर में न क़ैद कर जहाँ ज़िन्दगी की हवा न हो
कभी दिन की धूप में झूम के कभी शब के फूल को चूम के यूँ ही साथ साथ चलें सदा कभी ख़त्म अपना सफ़र न हो
मेरे पास मेरे हबीब[7] आ ज़रा और दिल के क़रीब आ तुझे धड़कनों में बसा लूँ मैं के बिछड़ने का कोई डर न हो
इति

Paired Painting
Dhola and Maru on a Camel
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