№ MMXXVI

RACHNA · A LIVING ARCHIVE

Rachna by M.

Loading the archive

MM · XXVI

Canvas
Dhola and Maru on a Camel

Shringara

कभी यूँ भी आ मेरी आँख में के मेरी नज़र को ख़बर न हो

Kabhi Yun Bhi Aa Meri Aankh Mein Ke Meri Nazar Ko Khabar Na Ho

Bashir Badr
2 min read 8 versesआँखeyeचाँदनी

8 verses · ~2 min

कभी यूँ भी आ मेरी आँख में के मेरी नज़र को ख़बर न हो मुझे एक रात नवाज़[1] दे मगर उसके बाद सहर न हो

वो बड़ा रहीम-ओ-करीम है मुझे ये सिफ़त[2] भी अता[3] करे तुझे भूलने की दुआ करूँ तो दुआ में मेरी असर न हो

मेरे बाज़ुओं में थकी-थकी, अभी महव-ए-ख़्वाब[4] है चांदनी न उठे सितारों की पालकी, अभी आहटों का गुज़र न हो

ये ग़ज़ल कि जैसे हिरन की आँखों में पिछली रात की चांदनी न बुझे ख़राबे की रोशनी, कभी बेचिराग़ ये घर न हो

वो फ़िराक़[5] हो या विसाल[6] हो, तेरी याद महकेगी एक दिन वो गुलाब बन के खिलेगा क्या, जो चिराग़ बन के जला न हो

कभी धूप दे, कभी बदलियाँ, दिल-ओ-जाँ से दोनों क़ुबूल हैं मगर उस नगर में न क़ैद कर जहाँ ज़िन्दगी की हवा न हो

कभी दिन की धूप में झूम के कभी शब के फूल को चूम के यूँ ही साथ साथ चलें सदा कभी ख़त्म अपना सफ़र न हो

मेरे पास मेरे हबीब[7] आ ज़रा और दिल के क़रीब आ तुझे धड़कनों में बसा लूँ मैं के बिछड़ने का कोई डर न हो

इति

Bashir Badr

The Poet

बशीर बद्र

Bashir Badr

Dhola and Maru on a Camel

Paired Painting

Dhola and Maru on a Camel

Open the viewer →

If this held you

Four more, in the same key.

Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Kabhi Yun Bhi Aa Meri Aankh Mein Ke Meri Nazar Ko Khabar Na Ho carries.