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Women at a Marriage Ceremony

HasyaIntermediate

कह-मुकरियाँ

Kah-Mukariyan

Amir Khusrow
4 min read 25 versesSatireFriendship

25 verses · ~4 min

१. खा गया पी गया दे गया बुत्ता ऐ सखि साजन? ना सखि कुत्ता!

२. लिपट लिपट के वा के सोई छाती से छाती लगा के रोई दांत से दांत बजे तो ताड़ा ऐ सखि साजन? ना सखि जाड़ा!

३. रात समय वह मेरे आवे भोर भये वह घर उठि जावे यह अचरज है सबसे न्यारा ऐ सखि साजन? ना सखि तारा!

४. नंगे पाँव फिरन नहिं देत पाँव से मिट्टी लगन नहिं देत पाँव का चूमा लेत निपूता ऐ सखि साजन? ना सखि जूता!

५. ऊंची अटारी पलंग बिछायो मैं सोई मेरे सिर पर आयो खुल गई अंखियां भयी आनंद ऐ सखि साजन? ना सखि चांद!

६. जब माँगू तब जल भरि लावे मेरे मन की तपन बुझावे मन का भारी तन का छोटा ऐ सखि साजन? ना सखि लोटा!

७. वो आवै तो शादी होय उस बिन दूजा और न कोय मीठे लागें वा के बोल ऐ सखि साजन? ना सखि ढोल!

८. बेर-बेर सोवतहिं जगावे ना जागूँ तो काटे खावे व्याकुल हुई मैं हक्की बक्की ऐ सखि साजन? ना सखि मक्खी!

९. अति सुरंग है रंग रंगीले है गुणवंत बहुत चटकीलो राम भजन बिन कभी न सोता ऐ सखि साजन? ना सखि तोता!

१०. आप हिले और मोहे हिलाए वा का हिलना मोए मन भाए हिल हिल के वो हुआ निसंखा ऐ सखि साजन? ना सखि पंखा!

११. अर्ध निशा वह आया भौन सुंदरता बरने कवि कौन निरखत ही मन भयो अनंद ऐ सखि साजन? ना सखि चंद!

१२. शोभा सदा बढ़ावन हारा आँखिन से छिन होत न न्यारा आठ पहर मेरो मनरंजन ऐ सखि साजन? ना सखि अंजन!

१३. जीवन सब जग जासों कहै वा बिनु नेक न धीरज रहै हरै छिनक में हिय की पीर ऐ सखि साजन? ना सखि नीर!

१४. बिन आये सबहीं सुख भूले आये ते अँग-अँग सब फूले सीरी भई लगावत छाती ऐ सखि साजन? ना सखि पाती!

१५. सगरी रैन छतियां पर राख रूप रंग सब वा का चाख भोर भई जब दिया उतार ऐ सखि साजन? ना सखि हार!

१६. पड़ी थी मैं अचानक चढ़ आयो जब उतरयो तो पसीनो आयो सहम गई नहीं सकी पुकार ऐ सखि साजन? ना सखि बुखार!

१७. सेज पड़ी मोरे आंखों आए डाल सेज मोहे मजा दिखाए किस से कहूं अब मजा में अपना ऐ सखि साजन? ना सखि सपना!

१८. बखत बखत मोए वा की आस रात दिना ऊ रहत मो पास मेरे मन को सब करत है काम ऐ सखि साजन? ना सखि राम!

१९. सरब सलोना सब गुन नीका वा बिन सब जग लागे फीका वा के सर पर होवे कोन ऐ सखि ‘साजन’ना सखि! लोन(नमक)

२०. सगरी रैन मिही संग जागा भोर भई तब बिछुड़न लागा उसके बिछुड़त फाटे हिया’ ए सखि ‘साजन’ ना, सखि! दिया(दीपक)

21. राह चलत मोरा अंचरा गहे। मेरी सुने न अपनी कहे ना कुछ मोसे झगडा-टंटा ऐ सखि साजन ना सखि कांटा!

22. बरसा-बरस वह देस में आवे, मुँह से मुँह लाग रस प्यावे। वा खातिर मैं खरचे दाम, ऐ सखि साजन न सखि! आम।।

23. नित मेरे घर आवत है, रात गए फिर जावत है। मानस फसत काऊ के फंदा, ऐ सखि साजन न सखि! चंदा।।

24. आठ प्रहर मेरे संग रहे, मीठी प्यारी बातें करे। श्याम बरन और राती नैंना, ऐ सखि साजन न सखि! मैंना।।

25. घर आवे मुख घेरे-फेरे, दें दुहाई मन को हरें, कभू करत है मीठे बैन, कभी करत है रुखे नैंन। ऐसा जग में कोऊ होता, ऐ सखि साजन न सखि! तोता।।

इति

Amir Khusrow

The Poet

अमीर खुसरो

Amir Khusrow

Women at a Marriage Ceremony

Paired Painting

Women at a Marriage Ceremony

In the luminous world of Mahadev Vishwanath Dhurandhar, the everyday rituals of Indian life are elevated to the sublime. This composition brings us into the private, sacred circle of women during a Maharashtrian wedding ceremony. There is a profound sense of sisterhood in their proximity, and the air feels thick with the scent of jasmine and the soft rustle of silk. Dhurandhar does not merely paint a scene: he honors the quiet strength and the elaborate aesthetic traditions of his people. Each fold of a saree and every piece of traditional jewelry is a testament to a cultural identity that remains vibrant. It is a moment of communal joy captured with a reverence that only a true master could achieve, blending academic techniques with a soul that is purely Indian.

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