
घुरफेकन लोहार
Ghurphekan Lohar
Shriprakash Shukla
6 verses · ~16 lines · 1 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

Karuna
Desh Ke Pradhanmantri Ke Nam Desh Ke Ek Nagrik Ka Khat
Shriprakash Shukla30 verses · ~15 min
प्रधानमंत्री जी,आपके काशी आगमन का हम तहेदिल से शुक्रिया अदा करते हैं हम इस बात की भी शुक्रिया अदा करते हैं कि यहां के घाटों की सफ़ाई हो गई है और गंगा के दूधिया जल में कुछ चेहरे अब उभरने लगे हैं
हम इस बात के भी शुक्रगुजार हैं कि यहाँ की ऊबड-खाबड़ सड़कें थोड़ी स्वस्थ व सुंदर हो गई हैं और कुछ समय के लिए ही सही यहाँ के रिक्शे व तांगे वाले अब यहाँ की गलियों में घुसते समय हिनहिनायेंगे नहीं
हम आपके इस आगमन को शहर की चिकनाई से जोड़कर देखते हैं और इस रुप में भी जोड़कर देखते हैं कि अपने पुरातन व्यवस्था में रगड़ खाता यह शहर यदि कभी आधुनिक दिखेगा तो वह आपकी यात्रा से ही संभव है जिसमें थोड़े समय के लिए यह भी अपने पंजों पर खड़ा हो आपको निहारता है थोड़ी देर के लिए यह आपकी अगवानी में ठहर-सा जाता है और थेाड़ी देर ही सही इसकी धमनियों में आधुनिकता से लबरेज एक ठकठक की आवाज लगातार बजती है जो कान में प्रवेश करने के पहले ही दिमाग में उतर-सी जाती है
लेकिन प्रधानमंत्री जी,आपके आने व जाने के बीच कुछ ऐसे सवाल हैं जेा आपके गुजरने के बाद की छोड़ी हुई हवाओं में बरवक्त तैरते रहते हैं कि आखिरकार यह सब देश के प्रधानमंत्री के खाते में दर्ज़ होता है या फिर देश के नागरिकों के खाते का भी इससे कुछ संबंध होता है
क्या देश के प्रधानमंत्री के खाते में ऐसी ही चिकनी-चिकनी बातें दर्ज़ होती हैं जहाँ खुरदुरेपन के लिए कोई्र जगह नहीं होती या फिर देश के नागरिक के भाग में उतना ही बदा होता है जितना की देश के प्रधानमंत्री को सरकने के लिए जरुरी होता है!
आपकी आगवानी में जो कुछ होता है उससे हमें ऐतराज नहीं हमें इससे भी ऐतराज नहीं कि आपका शहर आगमन शहर की नींद में एक सपने की तरह होता है
लेकिन प्रधानमंत्री जी, उस युवती ने आपका क्या बिगा़ड़ा था जो लंका के भीड़ भरे चौराहे पर अस्पताल जाने के लिए अंतिम साँसे ले रही थी और आपके सुरक्षा दस्ते में इतनी सुरक्षित थी की करवट भी नहीं बदल पा रही थी
कराहना तो दंडनीय अपराध था ही क्योंकि इससे आपकी नींद को ख़तरा था और आपकी नींद की हिफ़ाजत करना उसके लिए एक बड़े राष्ट्रीय दायित्व को निभाने जैसा था
इधर हम थे कि जो कभी शब्दों से लोहा गलाने की क्षमता रखते थे जो कभी शब्दों से पर्वत ढहा सकते थे जो कभी शब्दों से आपकी नींद हवा कर सकते थे उस आदमी को तनिक भी नहीं पिघला पा रहे थे जो आपकी ओर से हमारी सुरक्षा में खड़ा था
कभी आपने सोचा की आपकी इस यात्रा में उसकी जो साँसे अटक गई थीं उन साँसों के चलते रहने में आपके देश की क्या भूमिका है या कि जिन शब्दों से हमारा भरोसा छिन गया है उनसे खुद आप कितने सुरक्षित रह गए हैं?
प्रधानमंत्री जी,आखिरकार उस गौरैया ने आपका क्या बिगाड़ा था जो सड़क पर फुदक रही थी उस कुते ने आपका क्या बिगाड़ा था जो केवल बाँस की बल्लियों को लांघने के अपराध में इस दुनिया से विदा हो गया और तो और उस सांड़ ने आपका क्या बिगाड़ा था जो अलमस्त ढंग से सड़क के एक किनारे बैठा देश का जायजा ले रहा था
क्या आपने कभी सोचा कि जिस सांड़ को आपकी सरकार ने देश निकाला दे दिया उसके घर को बनाने में आपकी सरकार ने अभी तक क्या किया है
वह आज भी सड़क के बीचो-बीच वैसे ही टहलता है जैसे कि अपने जन्म के समय सड़क के ठीक बीच में पैदा हुआ था
प्रधानमंत्री जी, जब आप लाल किले से देश के नौनिहालों के नाम संबोधन करते हैं तब मेरे मन में कोई सवाल नहीं उठता क्योंकि देश के झंडे के नीचे हमें कुछ न बोलने का एक ऐसा संस्कार जनमघुटटी की तरह दे दिया जाता है कि आप जो कुछ भी बोलेंगे देस की पवित्र जनता के लिए पवित्र झंडे के माध्यम से पवित्र मन से ही बोलेंगे
आप वहां बैठे रहते हैं तब भी मेरे मन में कोई सवाल नहीं उठता क्योंकि जिस शहर में आप रहते हैं और जिसे हमारी धड़कनों के रुप में बताया जाता है वह शुरु से ही सवालों के बाहर है- लगभग अपने देवता की तरह जिन पर सवाल करना अपनी ही वेवफाई्र का इज़हार करना है
किंतु जब आप बाहर रहते हैं मसलन की यही कि जब आप हमारे इस पवित्र शहर में रहते हैं और शहर की प्राचीनता व पवित्रता व जातीयता व मानवता व जाने किस किस प्रत्ययी ‘ता’ पर बोल रहे होते हैं तब मेंरे मन में आपको लेकर बार-बार सवाल उठता है कि आप कैसे बोल रहे होंगे उस जगह पर जहाँ पर आपको हिलने भर की आज़ादी नहीं मिलती जहाँ आप आराम से नाक भी नहीं खुजला सकते और जहाँ पांव भर फैलाने की आज़ादी भी नहीं होती
मुसकुराना तो यूं भी राष्ट्रीय अपराध होता है!
क्या हमारे देवता ऐसे ही होते हैं प्रधानमंत्री जी या फिर जिसे देवता बनाना होता है उन्हें ऐसा ही कर दिया जाता है कि वे ठीक से हिल-डुल भी न सकें ठीक से हँस भी न सकें ठीक से बोलने को कौन कहे ठीक से सुन भी न सकें!
प्रधानमंत्री जी , जितना आप कैमरे के इस देखने में रम रहते हैं कितना अच्छा होता कि आप हमारे देखने को लेकर भी थेाड़ा नम रहते
थोड़ा यह भी समझते कि आपके इस शहर में कोई है जो जनता के नाम पर समझ रहा है
तब कितना अच्छा होता कि इस देश में सिरफिरों की संख्या थोड़ी कम होती देस की जनता थोड़ी गम खाती और जिसे कहने के लिए हमें तरह तरह के शिल्प को ईजाद करना पड़ता है उसे आपसे सीधे कह सकते
न सही आपके शहर का होकर अपने शहर का होकर तो बोल ही सकते।
प्रधानमंत्री जी ,क्या कभी आपने सोचा है कि आपके शहर में हमारा तनिक भी प्रवेश आपके शहर में एक ऐसे खैाफ़ को जन्म देता है जिसमें बहुतों की जान केवल इसलिए चली जाती है कि कभी वे ऐसा न सोचें जबकि हमारे शहर में आपका प्रवेश इस तरह होता है जैसे यह शहर आपका बनिहार हो जहां जब तब आप दावा ठोंकने के लिए चला आया करते हैं
या कि यह भी कि जब भी आपको खखारने की इच्छा होती है जब भी आपको निबटने की इच्छा होती हे जब भी आपको कुछ टपकाने की इच्छा होती है इस शहर में आ धमकते हैं जहां शहर की हवाओं तक को आपको गुदगुदाने की मनाही है जहां शहर में चमकता सूरज आपको छू भी नहीं सकता जहां की धरती आपके पांवों को सहला भी नहीं सकती!
गंगा की तो बात ही अलग है वह तो बेचारी यूं भी आपके आगमन से लुड़िया़ जाती है ।
प्रधानमंत्री जी ,इतनी धरती ,इतना आकाश,इतना सूरज और इतनी हवाओं को लेकर आप स्वयं चलते हैं कि हमारे लिए कठिन हो जाता है अपनी हवाओं को समझना कठिन हो जाता है अपने देस की गंध को महसूसना और जब तक हमें कुछ सूझता है आप गुजर चुके होते हैं हमारी हवाओं से
प्रधानमंत्री जी , कहने को तो बहुत कुछ है और यह बहुत कुछ आपके लिए कुछ भी नहीं है फिर भी इतना तो कहा ही जा सकता है कि आपका सब कुछ जिस काफिला के नाम पर घटित होता है उसमें हमारे लिए सिवाय इसके कोई जगह नहीं बचती कि हम अपना अपना क़ाफ़िया मिलाकार अपने को ठीक करें और एक काफ़िर की तरह उपद्रवी घोषित किये जाने के पहले ही अपने को देश की सुरक्षा के नाम पर समर्पित कर दें
और बावजूद इसके आपका जयघोष करें फिर भी जयहिंद की तरह जय जय हिंद की तरह!
प्रधानमंत्री जी, मैं जानता हूं कि मेरा यह सवाल भी जैसा की अब तक होता आया है एक सिरफिरे के भड़ांस निकालने वाले खाते में दर्ज़ होगा जिस खाते में पहले से ही भारी आंकड़े दर्ज़ हैं लेकिन सवाल फिर भी सवाल है कि इतनी सडांध को पचाते हए इतनी चिकनाई का हम क्या करें जिसमें मक्खियों तक की सुरक्षा में सरकार का सुरक्षा दस्ता मुस्तैद रहता है ।
रचनाकाल: 14.03.2008
इति

Paired Painting
View of the Ganges from the Phatuk or Gate at the Top of Punchgunga Ghat
In the early nineteenth century, James Prinsep served as the assay master at the Benares Mint, yet his true devotion lay in documenting the ancient soul of the holy city. Enchanted by the steep stone steps, sacred bathing ghats, and majestic riverside temples, Prinsep drew Varanasi with exceptional precision and deep affection. This remarkable view presents an intimate perspective from inside a heavy wooden gateway at the top of Panchganga Ghat. The dark, beautifully carved doors open outward to create a dramatic architectural frame, guiding the eye from shadow into the brilliant air of the riverfront below, where stone platforms, moored boats, and the tranquil flow of the sacred Ganges stretch out toward the far shore.
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