
घंटा
Ghanta
Sumitranandan Pant
1 verse · ~10 lines · 1 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

2 verses · ~1 min
बैंक में लड़कियाँ बड़ी होती जाती हैं और इतनी भीड़ से घिरी हुई एकाकी
वह अपने तीस बरस औरत और व्यक्ति के बनने के तीस बरस लिए हुए रोज़ यहाँ आती हैं वक्त से ध्यान से सुनती है नौज़वान ग्राहक को खो नहीं जाती हैं स्वप्न में उस लड़के को कहीं जाने नहीं देती है फ़िलहाल फिर चला जाता है वह अपने काम से इस लेनदेन के बाद वह बजाती है एक सुहानी घण्टी दौड़कर भीड़ भर जाती है छोटे-छोटे पुरूषों की एकांत में कुटे-पिटे चेहरों पर लालच लिए हुए खिड़की से झाँकते ।
इति

Paired Painting
Reclining Woman
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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Bank Mein Ladkiyan carries.