№ MMXXVI

RACHNA · A LIVING ARCHIVE

Rachna by M.

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MM · XXVI

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Krishna Embracing Radha

Shringara

पदावली / भाग-5

Padavali / Bhag-5

Mirabai
17 min read 30 versesप्रेमloveदीवानी

30 verses · ~17 min

1. छैल बिराणे लाख को हे अपणे काज न होइ। ताके संग सीधारतां हे, भला न कहसी कोइ। वर हीणों आपणों भलो हे, कोढी कुष्टि कोइ। जाके संग सीधारतां है, भला कहै सब लोइ। अबिनासी सूं बालवां हे, जिपसूं सांची प्रीत। मीरा कूं प्रभु मिल्या हे, ऐहि भगति की रीत॥

2. डर गयोरी मन मोहनपास, डर गयोरी मन मोहनपास॥१॥ बीरहा दुबारा मैं तो बन बन दौरी। प्राण त्यजुगी करवत लेवगी काशी॥२॥ मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। हरिचरणकी दासी॥३॥

3. तुम कीं करो या हूं ज्यानी। तुम०॥ध्रु०॥ ब्रिंद्राजी बनके कुंजगलीनमों। गोधनकी चरैया हूं ज्यानी॥१॥ मोर मुगुट पीतांबर सोभे। मुरलीकी बजैया हूं ज्यानी॥२॥ मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। दान दिन ले तब लै हुं ज्यानी॥३॥

4. म्हारे घर आओ प्रीतम प्यारा।। तन मन धन सब भेंट धरूंगी भजन करूंगी तुम्हारा। म्हारे घर आओ प्रीतम प्यारा।। तुम गुणवंत सुसाहिब कहिये मोमें औगुण सारा।। म्हारे घर आओ प्रीतम प्यारा।। मैं निगुणी कछु गुण नहिं जानूं तुम सा बगसणहारा।। म्हारे घर आओ प्रीतम प्यारा।। मीरा कहै प्रभु कब रे मिलोगे तुम बिन नैण दुखारा।। म्हारे घर आओ प्रीतम प्यारा।।

5. तुम बिन मेरी कौन खबर ले, गोवर्धन गिरिधारीरे॥ध्रु०॥ मोर मुगुट पीतांबर सोभे। कुंडलकी छबी न्यारीरे॥ तुम०॥१॥ भरी सभामों द्रौपदी ठारी। राखो लाज हमारी रे॥ तुम०॥२॥ मीराके प्रभु गिरिधर नागर। चरनकमल बलहारीरे॥ तुम०॥३॥

6. दूर नगरी, बड़ी दूर नगरी-नगरी कैसे मैं तेरी गोकुल नगरी दूर नगरी बड़ी दूर नगरी रात को कान्हा डर माही लागे, दिन को तो देखे सारी नगरी। दूर नगरी... सखी संग कान्हा शर्म मोहे लागे, अकेली तो भूल जाऊँ तेरी डगरी। दूर नगरी... धीरे-धीरे चलूँ तो कमर मोरी लचके झटपट चलूँ तो छलकाए गगरी। दूर नगरी... मीरा कहे प्रभु गिरधर नागर, तुमरे दरस बिन मैं तो हो गई बावरी। दूर नगरी...

7. तुम लाल नंद सदाके कपटी॥ध्रु०॥ सबकी नैया पार उतर गयी। हमारी नैया भवर बिच अटकी॥१॥ नैया भीतर करत मस्करी। दे सय्यां अरदन पर पटकी॥२॥ ब्रिंदाबनके कुंजगलनमों सीरकी। घगरीया जतनसे पटकी॥३॥ मीराके प्रभु गिरिधर नागर। राधे तूं या बन बन भटकी॥४॥

8. तुम सुणौ दयाल म्हारी अरजी॥ भवसागर में बही जात हौं, काढ़ो तो थारी मरजी। इण संसार सगो नहिं कोई, सांचा सगा रघुबरजी॥ मात पिता औ कुटुम कबीलो सब मतलब के गरजी। मीरा की प्रभु अरजी सुण लो चरण लगाओ थारी मरजी॥

9. तुम्हरे कारण सब छोड्या, अब मोहि क्यूं तरसावौ हौ। बिरह-बिथा लागी उर अंतर, सो तुम आय बुझावौ हो॥ अब छोड़त नहिं बड़ै प्रभुजी, हंसकर तुरत बुलावौ हौ। मीरा दासी जनम जनम की, अंग से अंग लगावौ हौ॥

10. तेरे सावरे मुख पर वारी। वारी वारी बलिहारी॥ध्रु०॥ मोर मुगुट पितांबर शोभे। कुंडलकी छबि न्यारी न्यारी॥१॥ ब्रिंदामन मों धेनु चरावे। मुरली बजावत प्यारी॥२॥ मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। चरण कमल चित्त वारी॥३॥

11. मेरी गेंद चुराई। ग्वालनारे॥ध्रु०॥ आबहि आणपेरे तोरे आंगणा। आंगया बीच छुपाई॥१॥ ग्वाल बाल सब मिलकर जाये। जगरथ झोंका आई॥२॥ साच कन्हैया झूठ मत बोले। घट रही चतुराई॥३॥ मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। चरणकमल बलजाई॥४॥

12. तोती मैना राधे कृष्ण बोल। तोती मैना राधे कृष्ण बोल॥ध्रु०॥ येकही तोती धुंडत आई। लकट किया अनी मोल॥तोती मै०॥१॥ दाना खावे तोती पानी पीवे। पिंजरमें करत कल्लोळ॥ तो०॥२॥ मीराके प्रभु गिरिधर नागर। हरिके चरण चित डोल॥ तो०॥३॥

13. तोरी सावरी सुरत नंदलालाजी॥ध्रु०॥ जमुनाके नीर तीर धेनु चरावत। कारी कामली वालाजी॥१॥ मोर मुगुट पितांबर शोभे। कुंडल झळकत लालाजी॥२॥ मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। भक्तनके प्रतिपालाजी॥३॥

14. तोसों लाग्यो नेह रे प्यारे, नागर नंद कुमार। मुरली तेरी मन हर्यो, बिसर्यो घर-व्यौहार॥ जब तें सवननि धुनि परि, घर आँगण न सुहाइ। पारधि ज्यूँ चूकै नहीं, मृगी बेधी दइ आइ॥ पानी पीर न जानई ज्यों मीन तड़फि मरि जाइ। रसिक मधुप के मरम को नहिं समुझत कमल सुभाइ॥ दीपक को जो दया नहिं, उड़ि-उड़ि मरत पतंग। 'मीरा' प्रभु गिरिधर मिले, जैसे पाणी मिलि गयो रंग॥

15. थारो विरुद्ध घेटे कैसी भाईरे॥ध्रु०॥ सैना नायको साची मीठी। आप भये हर नाईरे॥१॥ नामा शिंपी देवल फेरो। मृतीकी गाय जिवाईरे॥२॥ राणाने भेजा बिखको प्यालो। पीबे मिराबाईरे॥३॥

16. तो पलक उघाड़ो दीनानाथ,मैं हाजिर-नाजिर कद की खड़ी॥ साजणियां दुसमण होय बैठ्या, सबने लगूं कड़ी। तुम बिन साजन कोई नहिं है, डिगी नाव मेरी समंद अड़ी॥ दिन नहिं चैन रैण नहीं निदरा, सूखूं खड़ी खड़ी। बाण बिरह का लग्या हिये में, भूलुं न एक घड़ी॥ पत्थर की तो अहिल्या तारी बन के बीच पड़ी। कहा बोझ मीरा में करिये सौ पर एक धड़ी॥

17. हे री मैं तो प्रेम दिवानी, मेरो दरद न जाणै कोय। सूली ऊपर सेज हमारी सोवण किस विध होय। गगन मंडल पर सेज पिया की किस विध मिलणा होय। घायलकी गत घायल जाणै जो कोई घायल होय। जौहरि की गति जौहरी जाणै दूजा न जाणै कोय। दरद की मारी बन-बन डोलूँ बैद मिल्या नहिं कोय। मीराँ की प्रभु पीर मिटे जब बैद साँवलिया होय।

18. दरस बिनु दूखण लागे नैन। जबसे तुम बिछुड़े प्रभु मोरे, कबहुं न पायो चैन॥ सबद सुणत मेरी छतियां कांपे, मीठे लागे बैन। बिरह कथा कांसूं कहूं सजनी, बह गई करवत ऐन॥ कल न परत पल हरि मग जोवत, भई छमासी रैन। मीरा के प्रभू कब र मिलोगे, दुखमेटण सुखदैन॥

19. दीजो हो चुररिया हमारी। किसनजी मैं कन्या कुंवारी॥ध्रु०॥ गौलन सब मिल पानिया भरन जाती। वहंको करत बलजोरी॥१॥ परनारीका पल्लव पकडे। क्या करे मनवा बिचारी॥२॥ ब्रिंद्रावनके कुंजबनमों। मारे रंगकी पिचकारी॥३॥ जाके कहती यशवदा मैया। होगी फजीती तुम्हारी॥४॥ मीराके प्रभु गिरिधर नागर। भक्तनके है लहरी॥५॥

20 . दरस बिन दूखण लागे नैन। जबसे तुम बिछुड़े प्रभु मोरे, कबहुं न पायो चैन। सबद सुणत मेरी छतियां, कांपै मीठे लागै बैन। बिरह व्यथा कांसू कहूं सजनी, बह गई करवत ऐन। कल न परत पल हरि मग जोवत, भई छमासी रैन। मीरा के प्रभु कब रे मिलोगे, दुख मेटण सुख देन।

21 . मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई।। जाके सिर मोर मुकुट मेरो पति सोई। तात मात भ्रात बंधु आपनो न कोई।। छांडि दई कुलकी कानि कहा करिहै कोई। संतन ढिग बैठि बैठि लोकलाज खोई।। चुनरी के किये टूक ओढ़ लीन्ही लोई। मोती मूंगे उतार बनमाला पोई।। अंसुवन जल सीचि सीचि प्रेम बेलि बोई। अब तो बेल फैल गई आंणद फल होई।। दूध की मथनियाँ बड़े प्रेम से बिलोई। माखन जब काढ़ि लियो छाछ पिये कोई।। भगति देखि राजी हुई जगत देखि रोई। दासी मीरा लाल गिरधर तारो अब मोही।।

22. देखत राम हंसे सुदामाकूं देखत राम हंसे॥ फाटी तो फूलडियां पांव उभाणे चरण घसे। बालपणेका मिंत सुदामां अब क्यूं दूर बसे॥ कहा भावजने भेंट पठाई तांदुल तीन पसे। कित गई प्रभु मोरी टूटी टपरिया हीरा मोती लाल कसे॥ कित गई प्रभु मोरी गउअन बछिया द्वारा बिच हसती फसे। मीराके प्रभु हरि अबिनासी सरणे तोरे बसे॥

23. देखोरे देखो जसवदा मैय्या तेरा लालना, तेरा लालना मैय्यां झुले पालना॥ध्रु०॥ बाहार देखे तो बारारे बरसकु। भितर देखे मैय्यां झुले पालना॥१॥ जमुना जल राधा भरनेकू निकली। परकर जोबन मैय्यां तेरा लालना॥२॥ मीराके प्रभु गिरिधर नागर। हरिका भजन नीत करना॥ मैय्यां०॥३॥

24. नहिं एसो जनम बारंबार॥ का जानूं कछु पुन्य प्रगटे मानुसा-अवतार। बढ़त छिन-छिन घटत पल-पल जात न लागे बार॥ बिरछ के ज्यूं पात टूटे, लगें नहीं पुनि डार। भौसागर अति जोर कहिये अनंत ऊंड़ी धार॥ रामनाम का बांध बेड़ा उतर परले पार। ज्ञान चोसर मंडा चोहटे सुरत पासा सार॥ साधु संत महंत ग्यानी करत चलत पुकार। दासि मीरा लाल गिरधर जीवणा दिन च्यार॥

25. नहिं भावै थांरो देसड़लो जी रंगरूड़ो॥ थांरा देसा में राणा साध नहीं छै, लोग बसे सब कूड़ो। गहणा गांठी राणा हम सब त्यागा, त्याग्यो कररो चूड़ो॥ काजल टीकी हम सब त्याग्या, त्याग्यो है बांधन जूड़ो। मीरा के प्रभु गिरधर नागर बर पायो छै रूड़ो॥

26. नही जाऊंरे जमुना पाणीडा, मार्गमां नंदलाल मळे॥ध्रु०॥ नंदजीनो बालो आन न माने। कामण गारो जोई चितडूं चळे॥१॥ अमे आहिउडां सघळीं सुवाळां। कठण कठण कानुडो मळ्यो॥२॥ मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। गोपीने कानुडो लाग्यो नळ्यो॥३॥

27. नही तोरी बलजोरी राधे॥ध्रु०॥ जमुनाके नीर तीर धेनु चरावे। छीन लीई बांसरी॥१॥ सब गोपन हस खेलत बैठे। तुम कहत करी चोरी॥२॥ हम नही अब तुमारे घरनकू। तुम बहुत लबारीरे॥३॥ मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। चरणकमल बलिहारीरे॥४॥

28. नातो नामको जी म्हांसूं तनक न तोड्यो जाय॥ पानां ज्यूं पीली पड़ी रे, लोग कहैं पिंड रोग। छाने लांघण म्हैं किया रे, राम मिलण के जोग॥ बाबल बैद बुलाइया रे, पकड़ दिखाई म्हांरी बांह। मूरख बैद मरम नहिं जाणे, कसक कलेजे मांह॥ जा बैदां, घर आपणे रे, म्हांरो नांव न लेय। मैं तो दाझी बिरहकी रे, तू काहेकूं दारू देय॥ मांस गल गल छीजिया रे, करक रह्या गल आहि। आंगलिया री मूदड़ी (म्हारे) आवण लागी बांहि॥ रह रह पापी पपीहडा रे,पिवको नाम न लेय। जै कोई बिरहण साम्हले तो, पिव कारण जिव देय॥ खिण मंदिर खिण आंगणे रे, खिण खिण ठाड़ी होय। घायल ज्यूं घूमूं खड़ी, म्हारी बिथा न बूझै कोय॥ काढ़ कलेजो मैं धरू रे, कागा तू ले जाय। ज्यां देसां म्हारो पिव बसै रे, वे देखै तू खाय॥ म्हांरे नातो नांवको रे, और न नातो कोय। मीरा ब्याकुल बिरहणी रे, (हरि) दरसण दीजो मोय॥

29. नाथ तुम जानतहो सब घटकी, मीरा भक्ति करे प्रगटकी॥ध्रु०॥ ध्यान धरी प्रभु मीरा संभारे पूजा करे अट पटकी। शालिग्रामकूं चंदन चढत है भाल तिलक बिच बिंदकी॥१॥ राम मंदिरमें नाचे ताल बजावे चपटी। पाऊमें नेपुर रुमझुम बाजे। लाज संभार गुंगटकी॥२॥ झेर कटोरा राणाजिये भेज्या संत संगत मीरा अटकी। ले चरणामृत मिराये पिधुं होगइे अमृत बटकी॥३॥ सुरत डोरी पर मीरा नाचे शिरपें घडा उपर मटकी। मीरा के प्रभु गिरिधर नागर सुरति लगी जै श्रीनटकी॥४॥

30. नामोकी बलहारी गजगणिका तारी॥ध्रु०॥ गणिका तारी अजामेळ उद्धरी। तारी गौतमकी नारी॥१॥ झुटे बेर भिल्लणीके खावे। कुबजा नार उद्धारी॥२॥ मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर। चरणकमल बलिहारी॥३॥

इति

Mirabai

The Poet

मीराबाई

Mirabai

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Krishna Embracing Radha

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