
संध्या के बस दो बोल सुहाने लगते हैं
Sandhya Ke Bas Do Bol Suhane Lagate Hain
Makhanlal Chaturvedi
9 verses · ~30 lines · 2 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

4 verses · ~1 min
किरनों की शाला बन्द हो गई चुप-चपु अपने घर को चल पड़ी सहस्त्रों हँस-हँस उ ण्ड खेलतीं घुल-मिल होड़ा-होड़ी रोके रंगों वाली छबियाँ? किसका बस!
ये नटखट फिर से सुबह-सुबह आवेंगी पंखनियाँ स्वागत-गीत कि जब गावेंगी। दूबों के आँसू टपक उठेंगे ऐसे हों हर्ष वायु से बेक़ाबू- से जैसे।
कलियाँ हँस देंगी फूलों के स्वर होगा आगन्तुक-दल की आँखों का घर होगा, ऊँचे उठना कलिकाओं का वर होगा नीचे गिरना फूलों का ईश्वर होगा। शाला चमकेगी फिर ब्रह्माण्ड-भवन की खेलेंगी आँख-मिचौनी नटखट मन की।
इनके रूपों में नया रंग-सा होगा सोई दुनिया का स्वपन दंग-सा होगा यह सन्ध्या है, पक्षी चुप्पी साधेंगे किरणों की शाला बन्द हो गई- चुप-चुप।
इति

Paired Painting
Shakuntala and her friends
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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Jade Ki Sanjh carries.