
रहना नहिं देस बिराना है
Rahna Nahin Des Birana Hai
Kabir
1 verse · ~5 lines · 1 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

20 verses · ~5 min
मरूँ पर माँगू नहीं, अपने तन के काज | परमारथ के कारने, मोहिं न आवै लाज ||
मर जाऊँ, परन्तु अपने शरीर के स्वार्थ के लिए नहीं माँगूँगा| परन्तु परमार्थ के लिए माँगने में मुझे लज्जा नहीं लगती|
सुख के संगी स्वारथी, दुःख में रहते दूर | कहैं कबीर परमारथी, दुःख - सुख सदा हजूर ||
संसारी - स्वार्थी लोग सिर्फ सुख के संगी होते हैं, वे दुःख आने पर दूर हो जाते हैं| परन्तु परमार्थी लोग सुख - दुःख सब समय साथ देते हैं|
स्वारथ सुखा लाकड़ा, छाँह बिहूना सूल | पीपल परमारथ भजो, सुखसागर को मूल ||
स्वार्थ में आसक्ति तो बिना छाया के सूखी लकड़ी है और सदैव संताप देने वाली है और परमार्थ तो पीपल - वृक्ष के समान छायादार सुख का समुन्द्र एवं कल्याण की जड़ है, अतः परमार्थ को अपना कर उसी रस्ते पर चलो|
परमारथ पाको रतन, कबहुँ न दीजै पीठ | स्वारथ सेमल फूल है, कली अपूठी पीठ ||
परमार्थ सबसे उत्तम रतन है इसकी ओर कभी भी पीठ मत करो| और स्वार्थ तो सेमल फूल के समान है जो कड़वा - सुगंधहीन है, जिसकी कली कच्ची और उलटी अपनी ओर खिलती है|
प्रीति रीति सब अर्थ की, परमारथ की नहिं | कहैं कबीर परमारथी, बिरला कोई कलि माहिं ||
संसारी प्रेम - व्येवहार केवल धन के लिए हैं, परमार्थ के लिए नहीं| गुरु कबीर जी कहते हैं कि इस मतलबी युग में तो कोई विरला ही परमार्थी होगा|
साँझ पड़ी दिन ढल गया, बधिन घेरी गाय | गाय बिचारी न मरी, बधि न भूखी जाय ||
जीवनरूपी दिन ढल गया और अंतिम अवस्ता रुपी संध्या आ गयी, मृत्युरूपी सिहंनि ने देहध्यासी जीवरुपी गाय को घेर लिया| अविनाशी होने से जीवरुपी गाय नहीं मरती; मृत्युरूपी सिहंनि भूखी भी नहीं जाती|
सूम सदा ही उद्धरे, दाता जाय नरक्क | कहैं कबीर यह साखि सुनि, मति कोई जाव सरक्क ||
वीर्य को एकदम न खर्च करने वाला सूम तो उद्धार पाता है, और वीर्य का दान करने वाला दाता नरक में जाता है| इस साखी का अर्थ ठीक से सुनो - समझो, विषय में मत पतित होओ|
ऊनै आई बादरी, बरसन लगा अंगार | उठि कबीरा धाह दै, दाझत है संसार ||
अज्ञान की बदरी ने जीव को घेर लिया, और काम - कल्पना रुपी अंगार बरसने लगा| ऐ जीवों! चिल्लाकर रोते हुआ पुकार करते रहो कि "संसार जल रहा है "|
भँवरा बारी परिहरा, मेवा बिलमा जाय | बावन चन्दन धर किया, भूति गया बनराय ||
मनुष्य को ज्ञान होने पर - मन भँवरा विषय बाग लो त्यागकर, सतगुणरुपी मेवे के बाग में जाकर रम गया| स्वरुप - ज्ञानरुपी छोटे चन्दन - वृक्ष में स्थित किया और विस्तृत जगत - जंगल को भूल गया|
झाल उठी झोली जली, खपरा फूटम फूट | योगी था सो रमि गया, आसन रहि भभूत ||
काल कि आग उठी और शरीर रुपी झोली जल गई, और खोपड़ी हड्डीरुपी खपड़े टूट - फूट गये| जीव योगी था वह रम गया, आसन, चिता पर केवल राख पड़ी है|
इति
The Poet
Kabir
1398 · 1518
To speak of Kabir within the ordinary parameters of literary biography is almost impossible. Born in the fifteenth century to a Muslim weaver's family in the sacred Hindu city of Banaras, he became a voice that refused to be domesticated by any temple, mosque, or scholarly apparatus. Kabir claimed no scripture, no caste, and no sacred language as his exclusive property. He stood at the loom of reality and wove his dohas (devastating two-line couplets) from the raw thread of direct spiritual encounter. His critique was not merely religious but civilizational. He asked with the serene ferocity of an awakened mind why human beings had chosen the architecture of division over the open sky of the divine. Centuries have passed, empires have crumbled, and languages have shifted. Yet, Kabir's couplets are still recited in village squares and debated in universities today. He requires no temple because he built one inside language itself. He is the conscience of the Indian soul.

Paired Painting
Vyasa Dictating the Mahabharata to Ganesha
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If this held you
Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Paramarath Ki Mahima carries.