
माया महा ठगनी हम जानी
Maya Maha Thagni Hama Jani
Kabir
15 verses · ~8 lines · 1 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

22 verses · ~6 min
कबीर मन तो एक है, भावै तहाँ लगाव | भावै गुरु की भक्ति करू, भावै विषय कमाव ||
गुरु कबीर जी कहते हैं कि मन तो एक ही है, जहाँ अच्छा लगे वहाँ लगाओ| चाहे गुरु की भक्ति करो, चाहे विषय विकार कमाओ|
कबीर मनहिं गयन्द है, अंकुश दै दै राखु | विष की बेली परिहारो, अमृत का फल चाखू ||
मन मस्ताना हाथी है, इसे ज्ञान अंकुश दे - देकर अपने वश में रखो, और विषय - विष - लता को त्यागकर स्वरुप - ज्ञानामृत का शान्ति फल चखो|
मन के मते न चलिये, मन के मते अनेक | जो मन पर असवार है, सो साधु कोई एक ||
मन के मत में न चलो, क्योंकि मन के अनेको मत हैं| जो मन को सदैव अपने अधीन रखता है, वह साधु कोई विरला ही होता है|
मन के मारे बन गये, बन तजि बस्ती माहिं | कहैं कबीर क्या कीजिये, यह मन ठहरै नाहिं ||
मन की चंचलता को रोकने के लिए वन में गये, वहाँ जब मन शांत नहीं हुआ तो फिर से बस्ती में आगये| गुर कबीर जी कहते हैं कि जब तक मन शांत नहीं होयेगा, तब तक तुम क्या आत्म - कल्याण करोगे|
मन को मारूँ पटकि के, टूक टूक है जाय | विष कि क्यारी बोय के, लुनता क्यों पछिताय ||
जी चाहता है कि मन को पटक कर ऐसा मारूँ, कि वह चकनाचूर हों जाये| विष की क्यारी बोकर, अब उसे भोगने में क्यों पश्चाताप करता है?
मन दाता मन लालची, मन राजा मन रंक | जो यह मनगुरु सों मिलै, तो गुरु मिलै निसंक ||
यह मन ही शुद्धि - अशुद्धि भेद से दाता - लालची, उदार - कंजूस बनता है| यदि यह मन निष्कपट होकर गुरु से मिले, तो उसे निसंदेह गुरु पद मिल जाय|
मनुवा तो पंछी भया, उड़ि के चला अकास | ऊपर ही ते गिरि पड़ा, मन माया के पास ||
यह मन तो पक्षी होकर भावना रुपी आकाश में उड़ चला, ऊपर पहुँच जाने पर भी यह मन, पुनः नीचे आकर माया के निकट गिर पड़ा|
मन पंछी तब लग उड़ै, विषय वासना माहिं | ज्ञान बाज के झपट में, तब लगि आवै नाहिं ||
यह मन रुपी पक्षी विषय - वासनाओं में तभी तक उड़ता है, जब तक ज्ञानरूपी बाज के चंगुल में नहीं आता; अर्थार्त ज्ञान प्राप्त हों जाने पर मन विषयों की तरफ नहीं जाता|
मनवा तो फूला फिरै, कहै जो करूँ धरम | कोटि करम सिर पै चढ़े, चेति न देखे मरम ||
मन फूला - फूला फिरता है कि में धर्म करता हुँ| करोडों कर्म - जाल इसके सिर पर चढ़े हैं, सावधान होकर अपनी करनी का रहस्य नहीं देखता|
मन की घाली हुँ गयी, मन की घालि जोऊँ | सँग जो परी कुसंग के, हटै हाट बिकाऊँ ||
मन के द्वारा पतित होके पहले चौरासी में भ्रमा हूँ और मन के द्वारा भ्रम में पड़कर अब भी भ्रम रहा हूँ| कुसंगी मन - इन्द्रियों की संगत में पड़कर, चौरासी बाज़ार में बिक रहा हूँ|
महमंता मन मारि ले, घट ही माहीं घेर | जबही चालै पीठ दे, आँकुस दै दै फेर ||
अन्तः करण ही में घेर - घेरकर उन्मत्त मन को मार लो| जब भी भागकर चले, तभी ज्ञान अंकुश दे - देकर फेर लो|
इति
The Poet
Kabir
1398 · 1518
To speak of Kabir within the ordinary parameters of literary biography is almost impossible. Born in the fifteenth century to a Muslim weaver's family in the sacred Hindu city of Banaras, he became a voice that refused to be domesticated by any temple, mosque, or scholarly apparatus. Kabir claimed no scripture, no caste, and no sacred language as his exclusive property. He stood at the loom of reality and wove his dohas (devastating two-line couplets) from the raw thread of direct spiritual encounter. His critique was not merely religious but civilizational. He asked with the serene ferocity of an awakened mind why human beings had chosen the architecture of division over the open sky of the divine. Centuries have passed, empires have crumbled, and languages have shifted. Yet, Kabir's couplets are still recited in village squares and debated in universities today. He requires no temple because he built one inside language itself. He is the conscience of the Indian soul.

Paired Painting
Dattatreya
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If this held you
Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Man Ki Mahima carries.