
नाता-रिश्ता-2
Nata-Rishta-2
Sachchidananda Hirananda Vatsyayan 'Agyeya'
1 verse · ~12 lines · 1 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

Shanta
Vah Qissa Hi Kya Jo Chalta Nahin Rahe
Divik Ramesh18 verses · ~7 min
किस्सा यूं है कि गवाह पाण्डेय - और चौंक पाण्डेयपुर का रास्ता-सारनाथ और धूल से अँटा, मुश्किल से पहचान में आता 'ऑटो' और हड्डियों को संभालते-संभालते ऑटो में, मैं और पाण्डेय।
लाज से या कहूं शर्म से गड़ी जाती सड़क। जगह-जगह फटी साड़ी से गड्ढे। ठहरिए भी तनिक सब्र भी कीजिए जी किस्सा भी आएगा बगल ही में तो है।
पहले सुन तो लीजिए पेट की भी बिखरा जा रहा है जिसका सब-कुछ इधर-उधर। ले रहा है टक्कर हमारे हौसलों से पूरी। हिचकोले थे कि नहीं, ले पा रहे थे सांस तक। दम बहुत था, पर ऑटो में जबकि चालक ज़रूर बिदक लेता था जब-तब। और भींच लेते थे हम अपनी-अपनी जेबें।
तो किस्सा यूं है कि गवाह है, पाण्डेय और चौंक पाण्डेयपुर का कि हम दोनों सारनाथ से ज़्यादा राह पर थे लमही के और जा रहे थे मिलने प्रेमचन्द के पात्रों से। ख़ैर पहुंचे तो अच्छा लगा सबकुछ भूल कर सामने था प्रेमचन्द-द्वार लमही का और थे दोनों ओर खड़े, कुछ बैठे भी पात्र प्रेमचन्द के, कुछ हांफते पर उत्सुक।
थे कि वे भी आए थे, वहां धूल-धक्क़ड़ खाते हमारी ही तरह ऑटो पर, बैलगाड़ी तो कहीं दिख नहीं रही थी। पेट तो इनके भी रहे होंगे हमारी ही तरह और सड़कें भी शर्म की मारी।
लगा कि न वे पहचान पा रहे थे हमें और न हम ही उन्हें शायद।
सिर चढ़ कर बोल रहा था धूल का महत्व दोनों ओर ही। कितना एकाकार कर सकती है धूल भी अगर आ जाए अपने पर।
जानता हूं, जानता हूं पर कोई विदेशी तो नहीं है न ठेठ यहीं के है, इसी देश के सो टिप्पणी तो ससुर मिली ही होगी न जन्मघुट्टी में धरी रहती है जो ज़बान पर। लो फिर कर गए टिप्पणी।
क्या सचमुच नहीं चाहता मन आज इतराने का देश पर! तो किस्सा यूं है कि धूल ओढ़े धूल बिछाए धूल खाए और धूल ही पेश किए एक दूसरे को हम अपनापा खोकर भी बहुत अपने दिख रहे थे एक दूसरे को। जितने ललकाए हम थे उतने ही तो दिख रहे थे पात्र प्रेमचन्द के भी।
लगता था जाने कब तक की अटकी पड़ी प्रतीक्षा आंखों में टप-टप टपक पड़ी थी।
संधाए आकाश में कोई देवता नहीं था बस जाने कहां से आकर त्रिलोचन मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे और बगल में निराला आज़ादी का गीत गुनगुना रहे थे जबकि नागार्जुन ढपली बजा रहे थे और शमशेर संभाल-संभाल कर फूल बरसा रहे थे।
पता नहीं पाण्डेय का ध्यान तब किस ओर था पर इतना तय था कि वह उस दृश्य से महरूम रह गया था।
दूर-दूर तक कहीं कोई शिकायत नहीं थी। धुल चुकी थीं प्रेमचन्द के पात्रों की आंखें। सुरसुरा कर देह बैलों तक ने झाड़ ली थी धूल-मिट्टी जमी कब की। सुध तो ली थी न किसी ने उनकी। कैसा लगा होगा उन्हें कैसा?
सोचता हूं जैसे बहुत दिनों के बाद गांव लौटा हो बेटा बहुत दूर शहर से घर बना चुका है जो वहीं, हो चुका है वहीं का उसका पता।
किस्सा यूं है कि अब आगे और कुछ नहीं-- होता भी क्या-मामूली आदमियों का मामूली किस्सा! कि मुझे याद हो आया था जर्मनी का न्यूरमबर्ग शहर कि शहर के स्टेशन के बाहर का चौराहा कि चौराहे की सड़क के एक ओर खड़ा लेखक और दूसरी ओर पिद्दी बना राजकुमार और उसको डांटता हुआ एक नन्हा बालक तना और उसकी बेकरी-मां, यानी पात्र लेखक के।
बस न वहां अंटा था लेखक धूल से और न ही पात्र उसके। और देखिए न दर्शक भी नहीं।
तो किस्सा यूं है कि वह किस्सा ही क्या जो चलता न रहे।
तो चलते है。
इति
The Poet
Divik Ramesh
1946 · 1980s
Divik Ramesh occupies a highly respected position in Hindi literature as a writer who treats both adult and children's poetry with equal intellectual rigor. Born Ramesh Chand Sharma in 1946 in Delhi, he dedicated his career to teaching while simultaneously building a vast and diverse body of literary work. He writes with a profound awareness of social inequalities and the quiet anxieties of modern urban life. His poetry collections, such as Khuli Aankhon Mein Aakash and Raste Ke Beech, are marked by a straightforward honesty that refuses to hide behind complex metaphors. Beyond his poetry for adults, he has made an immense contribution to children's literature, a field often overlooked by serious writers. Recognizing this lifelong dedication, he was awarded the Sahitya Akademi Bal Sahitya Puraskar in 2018. He has also translated extensively, building cultural bridges between Indian and South Korean literature. He is a writer who believes that literature must remain accessible, compassionate, and deeply rooted in human empathy.

Paired Painting
Devotees on the Ghats of Varanasi
This poignant oil painting captures a quiet, reverent moment along the ancient stone ghats of Varanasi. A small community of pilgrims, enveloped in warm shawls and draped in traditional saris, sits closely together under the protective shadow of a massive woven bamboo chhatri. Beyond this intimate circle, the timeless expanse of the river Ganges unfolds in soft pastel blues and greens, bearing solitary wooden boats gliding across its calm waters. The artist, an observant traveler through India, inscribed the place name Varanasi in Devanagari script next to their personal red seal stamp, forever preserving a quiet morning of shared stillness on the holy riverbanks.
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If this held you
Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Vah Qissa Hi Kya Jo Chalta Nahin Rahe carries.