№ MMXXVI

RACHNA · A LIVING ARCHIVE

Rachna by M.

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MM · XXVI

Canvas
Vishnu reclining on Shesha

Shanta

उम्मीद

Umeed

Divik Ramesh
1 min read 7 versesउम्मीदhopeसमय

7 verses · ~1 min

समय ठहरता है तो जागती है उम्मीद अँखुवाते ही ताकत उम्मीद की काल हो जाता है रफूचक्कर।

बहुत दूर तक खुल जाते हैं रास्ते पड़ाव हो उठते हैं दीप्त लगता है ब्रह्माण्ड ही उतर आया हो खुले रास्तों पर। और मिट गया हो भेद आदमी और देवता का।

एक आदमी निकल आता है डग भरता कद आकाश को भेद जाता है जिसका।

आकाश को भेदता आदमी करता रहता है महसूस कितने ही फूल, और सबसे खूबसूरत फूल आँसुओं के ज़मीन से जुड़े अपने पाँवों पर।

यहीं से शुरू होती है यात्रा जो एक राह में बदल जाती है आखिर जुट जाते हैं जिसकी रक्षा में तमाम नक्षत्र, ग्रह और तारे।

आकाश को भेदता आदमी व्याप जाता है धरती में।

ताज्जुब है लोग तब भी तलाशते रहते हैं आदतन आदमी को आकाश में।

इति

Divik Ramesh

The Poet

दिविक रमेश

Divik Ramesh

Vishnu reclining on Shesha

Paired Painting

Vishnu reclining on Shesha

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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Umeed carries.