
12 verses · ~2 min
तुम मृगनयनी, तुम पिकबयनी तुम छवि की परिणीता-सी, अपनी बेसुध मादकता में भूली-सी, भयभीता सी ।
तुम उल्लास भरी आई हो तुम आईं उच्छ्वास भरी, तुम क्या जानो मेरे उर में कितने युग की प्यास भरी ।
शत-शत मधु के शत-शत सपनों की पुलकित परछाईं-सी, मलय-विचुम्बित तुम ऊषा की अनुरंजित अरुणाई-सी;
तुम अभिमान-भरी आई हो अपना नव-अनुराग लिए, तुम क्या जानो कि मैं तप रहा किस आशा की आग लिए ।
भरे हुए सूनेपन के तम में विद्युत की रेखा-सी; असफलता के पट पर अंकित तुम आशा की लेखा-सी;
आज हृदय में खिंच आई हो तुम असीम उन्माद लिए, जब कि मिट रहा था मैं तिल-तिल सीमा का अपवाद लिए ।
चकित और अलसित आँखों में तुम सुख का संसार लिए, मंथर गति में तुम जीवन का गर्व भरा अधिकार लिए ।
डोल रही हो आज हाट में बोल प्यार के बोल यहाँ, मैं दीवाना निज प्राणों से करने आया मोल यहाँ ।
अरुण कपोलों पर लज्जा की भीनी-सी मुस्कान लिए, सुरभित श्वासों में यौवन के अलसाए-से गान लिए ,
बरस पड़ी हो मेरे मरू में तुम सहसा रसधार बनी, तुममें लय होकर अभिलाषा एक बार साकार बनी ।
तुम हँसती-हँसती आई हो हँसने और हँसाने को, मैं बैठा हूँ पाने को फिर पा करके लुट जाने को ।
तुम क्रीड़ा की उत्सुकता-सी, तुम रति की तन्मयता-सी; मेरे जीवन में तुम आओ, तुम जीवन की ममता-सी।
इति

Paired Painting
Sita and the Golden Deer
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