
काँटक बन मे
Kantak Ban Me
Buddhinath Mishra
6 verses · ~9 lines · 1 min
№ MMXXVI
RACHNA · A LIVING ARCHIVE
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MM · XXVI

7 verses · ~1 min
इन पथरीले वीरान पहाडों पर ज़िन्दगी थक गई है चढ़ते-चढ़ते ।
क्या इस यात्रा का कोई अंत नहीं हम गिर जाएँगे थक कर यहीं कहीं कोई सहयात्री साथ न आएगा क्या जीवन-भर कुछ हाथ न आएगा
क्या कभी किसी मंज़िल तक पहुँचेंगे या बिछ जाएँगे पथ गढ़ते-गढ़ते।
धुँधुआती हुई दिशाएँ: अंगारे ये खण्डित दर्पण: टूटे इकतारे कहते- इस पथ में हम ही नहीं नए हमसे आगे भी कितने लोग गए
पगचिह्न यहाँ ये किसके अंकित हैं हम हार गए इनको पढ़ते-पढ़ते ।
हमसे किसने कह दिया कि चोटी पर है एक रोशनी का रंगीन नगर क्या सच निकलेगा, उसका यही कथन या निगल जाएगी हमको सिर्फ़ थकन
देखें सम्मुख घाटी है या कि शिखर आ गए मोड़ पर हम बढ़ते-बढ़ते ।
इति

Paired Painting
Dark and difficult was the road
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Chosen for their rasa and their register, not their popularity. Each one carries some part of what Yatra carries.